क्या बिखर रहा है एक यूरोप का सपना

स्रोत: द्वारा हर्ष वी पंत: हिंदुस्तान

माना जाता था कि पश्चिमी यूरोप का इतिहास सबसे अनूठा है। एक ऐसा भौगोलिक क्षेत्र, जहां के देश खुशी-खुशी ब्रूसेल्स की परम-सत्ता के आगे अपनी संप्रभुता समर्पित करते गए और उनका नेतृत्व दुनिया के दूसरे देशों की समस्याओं के समाधान में जुटा रहा। उदार लोकतंत्र को उन्होंने सबसे अच्छा माना और मुक्त बाजार वाला पूंजीवाद इसका मार्गदर्शक मंत्र बना। राष्ट्रवाद जैसी चीजों के लिए वहां किसी के पास वक्त नहीं था। वे दूसरे मुल्कों को अपनी आदिम प्रवृत्तियां दिखाने के लिए फटकारते थे और बड़ी मजबूती के साथ उन्हें मानवाधिकारों के लिहाज से निर्मम शासन करार देते रहे। पर्यावरणीय मानक उनके नेतृत्व के मन बहलाने का एक अच्छा-खासा शगल रहा और अमेरिकी सुरक्षा के साये तले इन देशों ने रक्षा खर्चों में कटौती की काफी मुखर मांग की। पश्चिमी यूरोप का मानना था कि भौगोलिक सरहदों का कोई अर्थ नहीं, बल्कि मानव सुरक्षा ज्यादा अहम चीज है।

यूरोप का आज का संकट एक चेतावनी है कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति अब भी हॉब्स की दुनिया वाली ही है, जिससे पार पाना पश्चिमी यूरोप के लिए भी मुश्किल साबित हो रहा है। इस क्षेत्र में इन दिनों काफी बेचैनी फैली हुई है। ब्रेग्जिट के साथ ब्रिटेन यूरोप में अपनी भूमिका को लेकर संघर्ष कर रहा है। उसकी प्रधानमंत्री टेरेसा मे एक संकट से निपटती हैं कि दूसरा संकट उनके सामने आ खड़ा होता है। पिछले हफ्ते पार्टी नेता के तौर पर अपने खिलाफ पेश अविश्वास प्रस्ताव में उन्होंने जीत तो हासिल कर ली, पर खुद उनकी पार्टी के एक-तिहाई से अधिक सांसदों ने उनके खिलाफ मतदान किया। जाहिर है, कंजरवेटिव पार्टी में उनकी स्थिति कमजोर हो गई है।       

अपने नेतृत्व को बचाने के लिए अविश्वास प्रस्ताव पर वोटिंग से ठीक पहले टेरेसा मे ने अपने सांसदों से वादा किया कि 2022 के चुनाव से पूर्व वह पार्टी नेतृत्व त्याग देंगी। टेरेसा मे अपनी ब्रेग्जिट डील को पार्लियामेंट से पारित कराने के लिए भी संघर्ष कर रही हैं, क्योंकि संपूर्ण विपक्ष के साथ-साथ खुद उनकी पार्टी के दर्जनों सांसद इसके खिलाफ हैं। ब्रेग्जिट के समर्थक कई सांसदों को उस बीमा नीति पर ऐतराज है, जो आयरलैंड सीमा से जुड़ी है। और इसके बगैर ब्रिटेन के लिए एकतरफा कदम उठाना काफी मुश्किल होगा।

उधर फ्रांस पिछले चार हफ्तों से पेट्रोल-डीजल पर टैक्स बढ़ाने और कई अन्य मसलों के खिलाफ हिंसक विरोधों से जूझ रहा है। सोशल मीडिया की एक मुहिम से शुरू हुआ यह तथाकथित ‘येलो वेस्ट’ (पीली बनियान) आंदोलन लोगों से अपील कर रहा है कि अपना विरोध जताने के लिए पूरे फ्रांस में लोग अपने-अपने वाहन पर पीली जैकेट पहनकर सड़़क पर निकलें। इस आंदोलन का मुख्य मकसद आर्थिक हताशा और गरीब परिवारों के राजनीतिक अविश्वास को जताना है। इस आंदोलन को देश भर में व्यापक समर्थन मिल रहा है। जाहिर है, इस हिंसक आंदोलन के दबाव में फ्रांसीसी राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों को न्यूनतम वेतन बढ़ोतरी और टैक्स में छूट देने की घोषणा करनी पड़ी है।

एक वक्त था, जब मैक्रों के बारे में यह कहा जाता था कि जमर्नी की चांसलर एंजला मर्केल की जगह अब वह यूरोपीय संघ की आवाज बनेंगे। लेकिन फ्रांस में मैक्रों की लोकप्रियता तेजी से घट रही है और मर्केल ने अपनी रिटायरमेंट का एलान कर दिया है। मर्केल का संभावित उत्तराधिकारी जर्मनी के बाहर का कोई अज्ञात नेता है और जटिल यूरोपीय समस्याओं के समाधान की उसकी काबिलियत भी बहुत स्पष्ट नहीं।

बू्रसेल्स और यूरोपीय देशों के बीच की पारंपरिक समझ को लोकप्रियतावाद अलग रूप में नुकसान पहुंचा रहा है और इसकी ताजा नजीर है इटली और यूरोपीय संघ के बीच जारी कशकमश। इन दिनों इटली की सत्ता में बैठी लोकप्रियतावादी पार्टियों ने अपनी जनता से कई लुभावने वादे किए हैं, जिनमें से एक बेरोजगारों को न्यूनतम आय की गारंटी शामिल है। जाहिर है, इसके बाद इटली का यूरोपीय संघ से मुठभेड़ होना ही था। अपने किसी सदस्य देश के खिलाफ अभूतपूर्व कदम उठाते हुए यूरोपीय कमिशन ने इटली से कहा है कि वह अपने बजट की समीक्षा करे। इटली के प्रधानमंत्री जुजेप्पे कोंते ने अगले साल बजट घाटे के लक्ष्य में 2.04 फीसदी की कमी लाने का प्रस्ताव किया है, मगर ब्रूसेल्स इतने भर से संतुष्ट नहीं।

विस्थापन, इस्लाम और पहचान जैसे मसलों पर लोगों के बढ़़ते आक्रोश से निपटने में मुख्यधारा की पार्टियां चूंकि अक्षम हो रही हैं, इसलिए अति-दक्षिणपंथी पार्टियां यूरोपीय देशों में मजबूत होने लगी हैं। पोलैंड और हंगरी की लोकतांत्रिक संस्थाओं पर हुए हमलों ने यूरोपीय संघ की जम्हूरी बुनियाद के लिए गंभीर खतरा पैदा कर दिया है। अपनी अलग-अलग प्राथमिकताओं के बावजूद पोलैंड और हंगरी ने एक ‘अनुदार’ गठजोड़ किया है, ताकि वे यूरोपीय एकीकरण के कुछ मसलों पर अपने रुख की रक्षा कर सकें और यूरोपीय संघ तथा सदस्य देशों को अपने अंदरूनी मामलों में हस्तक्षेप का प्रतिरोध         कर सकें। हंगरी के प्रधानमंत्री विक्टर ओर्बन और       पोलैंड के असली नेता यरोस्लव केजिंस्की चाहते हैं कि यूरोपीय संघ सिर्फ संप्रभु देशों का एक समूह भर रहे, जिसका साझा बाजार हो। इन दोनों का यह रुख ब्रिटेन से मिलता-जुलता है।

एक यूरोप का सपना संकट से जूझ रहा है, जिससे निपटने में मौजूदा यूरोपीय नेतृत्व अप्रभावी दिख रहा है। और यह सब उस वक्त हो रहा है, जब ट्रम्प के नेतृत्व में अमेरिका ट्रांस-अटलांटिक साझीदारी के बुनियादी सिद्धांतों की समीक्षा कर रहा है। रूस और चीन की तरफ से भू-राजनीतिक और भू-आर्थिक चुनौतियां भी दिन-ब-दिन बढ़ती जा रही हैं। इसलिए इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि यूरोपीय देशों के लिए संप्रभुता फिर से अहम होने लगी है और ब्रूसेल्स का मुखौटा उतरने लगा है।

 

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