कंप्यूटर निगरानी की अंतर्कथा

स्रोत: द्वारा अनिल चमड़िया: राष्ट्रीय सहारा

सरकार ने किसी भी कंप्यूटर प्रणाली को इंटरसेप्ट करने, निगरानी और कोडर्वड्स भाषा का विश्लेषण करने के लिए दिल्ली पुलिस समेत दस केंद्रीय एजेंसियों को अधिकृत करने संबंधी अधिसूचना जारी कर दी। उसके बारे में सफाई दी है कि ये नियम कांग्रेस के मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार के दौरान 2009 में बनाए गए थे। भाजपा के नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व वाली राजग सरकार ने सिर्फ उन एजेंसियों को अधिसूचित किया है, जो यह कार्रवाई कर सकते हैं। यूं कहें कि यूपीए गठबंधन की सरकार ने जो नियम बनाए उन्हें यूपीए की विपक्षी गठबंधन राजग लागू कर रही है। दरअसल, सरकार नहीं बदलती है। उसका नेतृत्व करने वाली पार्टयिों और गठबंधन के नाम बदलते हैं।

इसे एक बड़े फलक पर देखना चाहिए। मनमोहन सिंह ने अपने प्रधानमंत्रित्व काल में देश के अंदर समता पसंद संगठनों और लोगों के साथ लोकतांत्रिक मूल्यों और मानवाधिकार के उल्लंघन की नीतियों को यह कहकर जायज ठहराने की कोशिश की थी कि देश की सुरक्षा को आंतरिक तौर पर खतरा है। नतीजतन कई दमनकारी नियम कानून बनाए गए। उस दौर में हर वह शख्स राष्ट्रदोही के रूप में चिह्नित किया जाता रहा जो नई आर्थिक नीतियों के मद्देनजर कॉरपोरेट दुनिया के विकास में बाधा नजर आ रहा था।

इसी आंतरिक असुरक्षा को नए सिरे से मोदी सरकार परिभाषित कर रही है। मनमोहन सिंह के ही वाक्य को दोहराते हुए पिछले दिनों राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल ने कहा कि देश की आंतरिक सुरक्षा खतरे में है। उन्होंने दस वर्षो तक की सख्ती की जरूरत जताई। सुरक्षा सलाहकार ने आकाशवाणी द्वारा आयोजित एक व्याख्यानमाला में कहा था कि भारत के लिए आंतरिक खतरे को संभालना बड़ी चुनौती है। नई आर्थिक नीतियों के साथ यह तय गुंथा हुआ है कि इससे देश में सामान्यजनों के भीतर असंतोष विकसित होता है। लोकतांत्रिक नीतियों और सिद्धांतों को महज दिखाने के लिए तो इस्तेमाल किया जा सकता है, लेकिन व्यवहार में इस्तेमाल करने की इजाजत देना नई आर्थिक नीतियों के लिए खतरा उत्पन्न करना है।

आंतरिक खतरे के नाम पर मनमोहन सिंह के कार्यकाल के दौरान जितनी कार्रवाइयां हुई, उनकी समीक्षा की जाए तो यह तय सामने आता है कि अंधाधुंध गिरफ्तारियां और दमन की घटनाएं हुई। भाजपा नई आर्थिक नीतियों को और आक्रामक तरीके से लागू करने की पक्षधर रही है। उसका यूपीए के खिलाफ अक्सर आरोप रहा है कि उसके नेतृत्व में नई आर्थिक नीतियों को लागू करने की गति बेहद धीमी रही। मोदी की सरकार तेजी के साथ आर्थिक नीतियों को ही लागू नहीं करती है, बल्कि भारत के वे पहले प्रधानमंत्री हैं, जो खुलेआम कॉरपोरेट घरानों के साथ अपने रिश्तों को लेकर गौरवान्वित महसूस करते हैं।

इस प्रश्न पर विचार होना चाहिए कि किसी भी देश के अंदर आंतरिक असुरक्षा महसूस करते वक्त किस तरह के उपकरण सामने आते हैं। क्या उन उपकरणों में विचारधारा है? क्या उन उपकरणों से लोकतांत्रिक चेतना है, जो अपने संवैधानिक अधिकारों के इस्तेमाल को लेकर सजग रहती है। आंतरिक सुरक्षा के लिए जो खतरा हो सकता है, वह आखिर क्या है? इसी के मद्देनजर सरकार द्वारा जारी की गई अधिसूचना का विश्लेषण किया जाना चाहिए। लेकिन अधिसूचना महज औपचारिकता है।

इसके इरादों को एक नीति के रूप में देखने की कोशिश करें तो सरकार की इससे जुड़ी अन्य गतिविधियों पर नजर डाली जा सकती है। केवल अधिसूचना तक भी अपनी बात को सीमित रखें तो हमें समझने की जरूरत है कि इसके क्या निहितार्थ हैं? घर-घर में कंप्यूटर का मतलब ऐसे माध्यम का होना है, जिससे कोई अपने संदेशों, विचारों और अभिव्यक्तियों को पुरी दुनिया से जोड़ सकता है। मीडिया की परिभाषा में हम कई कंपनियों और संस्थाओं द्वारा निकाले जाने वाले समाचार पत्र, प्रसारित किए जाने वाले टेलीविजन चैनलों आदि से लगाते हैं।

लेकिन इस परंपरागत परिभाषा में आमूल परिवर्तन आया है। इस रूप में कि इंटरनेट के विकास के कारण हर कंप्यूटरधारक माध्यम यानी मीडिया बन चुका है। ब्लॉग लेखन से लेकर वेबसाइट और वीडियों अपलोड करने के कई-कई मंच उसके पास हो गए हैं। कह सकते हैं कि हर घर में कंप्यूटर एक उपकरण है। एक माध्यम के रूप में भी उस हर शख्स के पास उपलब्ध है, जो देश-दुनिया की किसी भी घटना पर प्रतिक्रिया जाहिर कर सकता है। किसी भी मुद्दे पर अभियान चला सकता है। इस तरह कहें कि हर घर में पत्रकार मौजूद है।

मीडिया की इस बदलती परिभाषा को सरकारें बड़ी चुनौती के रूप में ले रही हैं। घटनाओं की पृष्ठभूमि में जाते हैं, तो हम पाते हैं कि हाल के दौर में कंप्यूटर यानी मोबाइल समेत उपकरण का इस्तेमाल करने वाले सजग लोगों के खिलाफ दमन की बहुतेरी घटनाएं सामने आई हैं। इस उपकरण के जरिए किसी के खिलाफ युद्ध जैसी घटनाएं देखने को मिलती हैं, जब भाड़े के सैनिक विरोधी विचारों की हत्या करने से गुरेज नहीं करते। लेकिन भाड़े के सैनिक तभी तक मैदान में टिके रह सकते हैं, जब तक खुराक-पानी मिलता है। लेकिन लोकतांत्रिक समाज में नागरिकों की चेतना को भाड़े के सैनिकों से रौंदा नहीं जा सकता है।

संस्थानों से निकलने वाले माध्यमों को लोकतंत्र के लिए जरूरी माना गया है, लेकिन सरकारों ने उन सांस्थानिक माध्यमों को साधने में सफलता हासिल की है। किसी भी सरकार के लिए संभव है कि बिना सेंसर लगाए मीडिया को अपने अनुकूल ढाल सकती है। लेकिन अनुभव किया गया है कि भारत जैसे देश में स्थापित माध्यमों के बगैर भी लोगों ने अपनी चेतना से अपने लिए जरूरी मुद्दों को अभियान में बदलने में कामयाबी हासिल की है। किसी घटना के खिलाफ अपनी प्रतिक्रियाओं को स्थापित मीडिया का मोहताज नहीं बनने दिया। कहें कि सरकारें सबसे ज्यादा आंतरिक असुरक्षा किसी से महसूस करती हैं, तो वह नागरिक चेतना है।

विपक्ष ने कंप्यूटर निगरानी करने या इंटरसेप्ट करने के फैसले की तीखी आलोचना की है। लेकिन यह औपचारिकता भर है। 2009 में सूचना प्रौद्योगिकी कानून के प्रावधान किए गए थे तब संसद मौन दिख रही थी। लेकिन अब गृह मंत्रालय के इस आदेश को संविधान के खिलाफ बताया जा रहा है। सुप्रीम कोर्ट में याचिका डालकर किसी भी व्यक्ति के खिलाफ कोई आपराधिक कार्रवाई करने या जांच शुरू नहीं करने का निर्देश देने का अनुरोध किया गया है।

 

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