भारतीय मुद्रा पर नेपाल की नोटबंदी

स्रोत: द्वारा पुष्परंजन: हिंदुस्तान

शकील अहमद मनमोहन सरकार में मंत्री रह चुके हैं। नेपाली मीडिया उनके एक बयान को लेकर उन्हें हीरो बनाने की कवायद में है। उन्होंने बयान दिया है कि मोदी सरकार के अहंकार की वजह से नेपाल के साथ मुद्रा वापसी वाला विवाद हल नहीं हो रहा है, जिससे सीमा आर-पार के लोगों की मुसीबतें बढ़ गई हैं। यूं तो शकील अहमद ने यह बयान दरभंगा में दिया था, मगर काठमांडू के अखबारों ने जिस तरह से उसे प्रस्तुत किया है, उससे लगता है, जैसे नेपाल जाकर ही अहमद ने यह बयान दिया हो। अहमद यदि नेपाल की धरती पर जाकर ऐसा वक्तव्य देते, तो सचमुच यह चिंता की बात होती।

आखिर नेपाल सरकार ने भारतीय करेंसी की ‘नोटबंदी’ को ही अंतिम इलाज क्यों मान लिया? यह सवाल कारोबारियों में जेरे-बहस है, वहां का मीडिया चुप है। सौ-पचास के इंडियन नोटों की किल्लत बढ़ी है। कारोबारियों को लाखों रुपये के नकद भुगतान सौ के नोटों के जरिये नहीं हो सकते, इन दोनों समस्याओं से आए दिन सीमा आर-पार के लोग जूझ रहे हैं। जिन्हें इलाज और थोक व्यापार जैसे काम के वास्ते 500 और 2,000 के बड़े नोट चाहिए, उनकी तो बैंड बज गई है। दक्षिण एशिया में केवल नेपाल और भूटान, दो ऐसे देश हैं, जहां कारोबार के लिए भारतीय मुद्रा के इस्तेमाल पर आपसी सहमति बनी हुई है।

आरबीआई से नेपाल राष्ट्र बैंक और भूटान स्थित रॉयल मोनेटरी अथॉरिटी (आरएमए) ने यह समझौता कर रखा है कि इन देशों के कारोबारी अथवा आम नागरिक 25 हजार रुपये तक की भारतीय करेंसी साथ में लेकर चल सकते हैं, और उसका इस्तेमाल भी कर सकते हैं। भूटान की स्थिति नेपाल से भिन्न रही है। चूंकि भूटान का 80 फीसदी व्यापार भारत से है, इस कारण उसे 30 अरब भारतीय रुपये के रिजर्व कोष की सुविधा दी गई है। भूटान को हर हफ्ते 25 करोड़ भारतीय रुपये की आवश्यकता पड़ती थी। मगर नोटबंदी के समय भारतीय रिजर्व बैंक भूटान को मात्र 10 करोड़ उपलब्ध कराने की स्थिति में था।

पेच दरअसल नेपाल के साथ 950 करोड़ रुपये की वापसी को लेकर फंसा है। नेपाल ने कहा है कि बदल चुके नोटों के ये बंडल भारत वापस ले और बदले में उसे 14 करोड़, 60 लाख डॉलर भुगतान करे। इसमें अड़चन यह है कि रुपया का जिस तरह अवमूल्यन होता गया है, उसमें नेपाल डॉलर में पेमेंट की राशि बढ़ाने की मांग भी कर सकता है, क्योंकि नेपाल द्वारा 14 करोड़, 60 लाख अमेरिकी डॉलर का दावा उस समय से किया गया है, जब हमारे यहां एक डॉलर 65-66 रुपये में उपलब्ध था।  

प्रश्न यह है कि करेंसी वापसी पर कुछ लिखत-पढ़त हुई थी क्या? नेपाल इस सवाल पर चुप है। नेपाल राष्ट्र बैंक के डिप्टी गवर्नर चिंतामणि शिवकोटी ने रायटर  से कहा था कि नोटबंदी के समय हमें नई दिल्ली से मौखिक आदेश मिला था कि नेपाल प्रति व्यक्ति 4,500 रुपये तक के पुराने नोट बदल सकता है। शायद यह एक बड़ी वजह है कि नेपाल, हेग स्थित अंतरराष्ट्रीय अदालत का दरवाजा नहीं खटखटा रहा है।

भारतीय नौकरशाही ने एक और महत्वपूर्ण विषय को उठाया है। उसका कहना है कि 500-1,000 के जो पुराने भारतीय नोट नेपाल राष्ट्र बैंक में आए, उनमें शामिल जाली नोटों को हम क्यों स्वीकारें? इस संदर्भ में उनका शक आईएसआई पर भी है, जिसके गुर्गे ऐसे अवसरों की ताक में रहा करते हैं। नेपाली वित्त मंत्रालय ने यह स्पष्ट नहीं किया है कि 950 करोड़ रुपये के बंडलों में जाली नोट कितने हैं? इस तथ्य की जांच कैसे हो, यह सवाल वित्त मंत्रालय और रिजर्व बैंक के गलियारे में कहीं गुम हो चुका था। प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली ने अप्रैल 2018 में नई दिल्ली की यात्रा से पहले अपने देशवासियों को आश्वस्त किया था कि वह इस मसले को सुलझाकर आएंगे। मगर उनके लौटने के नौ महीने बाद भी यह मामला लटका पड़ा था, और सरकार दबाव में है।

इस पूरे मामले में जो बात नेपाली लीडरशिप को चुभती रही है, वह है भूटान को दी गई प्राथमिकता। भूटान के साथ पुरानी करेंसी की वापसी वाली समस्या का निपटारा भारत ने मई 2017 में ही कर दिया था। मगर एक दिलचस्प वाकया 19 जून, 2018 को हुआ, जब भूटान का रिजर्व बैंक यानी रॉयल मोनेटरी अथॉरिटी (आरएमए) ने एक अधिसूचना जारी करके लोगों को चेतावनी दी कि भारतीय करेंसी कैश के रूप में न रखा करें, उसे तत्काल अपने-अपने बैंक में जमा करा दिया करें। आरएमए ने अपनी चेतावनी में कहा कि यदि भारतीय करेंसी को लेकर रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया किसी किस्म का बदलाव करता है, तो फिर हमारी कोई जिम्मेदारी नहीं होगी। क्या भूटान जैसे देश का भारतीय करेंसी से भरोसा उठ रहा है? यह सही है कि नोटबंदी के समय भूटान में आम आदमी और कारोबारियों को दिक्कतें दरपेश हुई थीं। एक समय ऐसा भी आया, जब लॉटरी के जरिए लोगों के नोट बदले गए।

नेपाल की ओली सरकार द्वारा भारतीय करेंसी की ‘नोटबंदी’ की वजहों को ठीक से खंगालने की आवश्यकता है। प्रधानमंत्री ओली ने 8 सितंबर, 2018 को ट्वीट किया था कि भारत द्वारा 2015 में नाकेबंदी का जबाव हमने ढूंढ़ लिया है। इस ट्वीट का निहितार्थ उससे दो दिन पहले हुए समझौते में था, जिसमें चीन ने उसे चार सी-पोर्ट- शिएनचिन, शेनचन, लिएनयुनकांग, झानचियांग और तीन ड्राई पोर्ट- ल्हानचोउ, ल्हासा और शिगात्से के इस्तेमाल की अनुमति दे दी थी।

गिरोंग पोर्ट की सुविधा नेपाल पहले से उठा रहा है। नेपाल में चीनी रेल प्रोजेक्ट का सर्वे भी हो चुका है। जब चीन से व्यापार विस्तार का इंतजाम ओली ने कर लिया है, तो नई दिल्ली से करेंसी की निर्भरता कम होना भी संभव है। यूं भी चीन से व्यापार युआन में हो रहा है। चीन को 85 से 90 फीसदी भुगतान हुंडी के जरिए हो रहा है। काठमांडू में नेपाली मुद्रा कैश में दीजिए और हांगकांग में हुंडी के जरिए चीनी कारोबारियों को पेमेंट हो जाया करता है। 2,000 से 200 तक की भारतीय करेंसी की नोटबंदी से नेपाल सरकार की परेशानी सतह पर न दिखना सचमुच दिलचस्प है।

 

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