सोच में भी बदलाव जरूरी

स्रोत: द्वारा विशेष गुप्ता: जनसत्ता

एक और विश्व शौचालय दिवस बीत गया। अपने देश में स्वच्छ भारत अभियान जारी है। दो अक्तूबर, 2019 तक महात्मा गांधी की स्वच्छता की संकल्पना के अनुरूप देश में स्वच्छता का विस्तार करने का संकल्प हमने किया है। गौरतलब है कि पिछले दिनों स्वच्छता के संदर्भ में ही ‘ओवर फ्लोइंग सिटीज’ विषय पर एक रिपोर्ट आई थी। इसमें कहा गया है कि भारत में शहरों की आबादी तेजी से बढ़ रही है, लेकिन तकलीफदेह यह है कि विश्व के अन्य शहरों के मुकाबले भारत में नगरों के दस करोड़ लोग अभी भी खुले में शौच करने को मजबूर हैं।

इस रिपोर्ट का सच यह है कि विश्व के शहरों के पांच लोगों में से एक के पास आज भी शौचालय नहीं है। आज भी लोग नगरों में शौचालय की कतार में नजर आते हैं। रिपोर्ट बताती है कि दुनिया में सत्तर करोड़ लोग अपने शौचालय से वंचित हैं, जिनमें दस करोड़ लोग भारत में हैं। इनमें भी अधिकांश लोग जो शौचालय का प्रयोग करते हैं, वे सभी भीड़-भाड़ वाले सामुदायिक शौचालय हैं। उनमें साफ-सफाई का घोर अभाव है। दूसरी ओर, सुरक्षा के लिहाज से भी ये सभी बहुत कमजोर स्थिति में हैं। रिपोर्ट बताती है कि दुनिया के ऐसे दस देशों में जहां के लोग सुरक्षित और निजी शौचालय से वंचित हैं, उनमें भारत के पड़ोसी देशों चीन, बांग्लादेश और पाकिस्तान की स्थिति कहीं ज्यादा खराब है। हालांकि भारत सरकार के स्वच्छता अभियान के प्रति जागरूकता से भारत को शौचालय की समस्या से राहत तो मिली है, लेकिन इस दिशा में अभी काफी कुछ किया जाना बाकी है।

नगर विकास मंत्रालय के हाल के आंकड़े बताते हैं कि दो अक्तूबर, 2014 के बाद से अभी तक देश में नौ करोड़ से भी अधिक शौचालयों का निर्माण हो चुका है। आंकड़े बताते हैं कि देश के पांच हजार से अधिक गांवों में शौचालयों का निर्माण हो चुका है। अब तक पच्चीस राज्य और पांच सौ तीस जिले खुले में शौच करने की प्रवृत्ति से मुक्त हो चुके हैं। लेकिन अभी जो स्थिति है, उससे यही लगता है कि अगले साल अक्तूबर तक भी इस मिशन का सत्तर से अस्सी फीसद ही काम पूरा हो पाएगा। नगर विकास मंत्रालय ने जो आंकड़े पेश किए हैं, उनसे यह भी पता चलता है कि देश में सार्वजनिक शौचालयों के निर्माण की स्थिति बहुत अच्छी नहीं है। कहना न होगा कि नगरों में अभी तक पच्चीस हजार सार्वजनिक शौचालयों का ही निर्माण हो पाया है, जो अक्तूबर 2019 के लक्ष्य का मात्र 25-30 फीसद है।

निश्चित ही भारत में गांवों के साथ नगरों में इस समय हर क्षेत्र व घर के लिए स्वच्छ शौचालय के निर्माण कराने की भारी चुनौती है। यह रिपोर्ट साफ कहती है कि देश में स्वच्छता की अवधारणा परंपराओं से जुड़ी होने के कारण तमाम बीमारियों को जन्म दे रही है। आंकड़े बताते हैं कि देश में शौचालय इत्यादि से जुड़ी स्वच्छता के अभाव में डायरिया जैसी बीमारी से तीन लाख से भी अधिक बच्चे हर साल मौत का शिकार हो जाते हैं। घरों में शौचालय न होने से महिलाओं व लड़कियों में असुरक्षा की भावना लगातार बढ़ रही है। यह वह वर्ग है जो शौच के लिए शाम अथवा अंधेरा होने का इंतजार करता है।

देश के गांव व नगरों में होने वाली यौन हिंसा की अधिकांश वारदातें इसी का परिणाम अधिक रही हैं। इसके अलावा, शिक्षण संस्थाओं में शौचालय न होने से अधिकांश लड़कियां स्कूल जाने में हिचकती हैं। यही वजह है कि उनमें बीच में ही पढ़ाई छोड़ देने की दर काफी तेजी बढ़ी है। देश में सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में साफ-सफाई न होने से चिकित्सा केंद्र भी कमजोर स्थिति में हैं। इसका दुष्परिणाम यह है कि स्वास्थ्य सेवा और स्वच्छता अभियान से जुड़े अन्य कर्मचरियों के लिए वहां होने वाले रोगों से बचना लगातार मुश्किल होता जा रहा है।

भारत को सार्वजानिक स्वास्थ्य आंदोलन या कहें कि स्वच्छता के इस चरण का पूर्ण साक्षी बनना अभी बाकी है। सही बात यह है कि भारत के कई राज्यों में स्वास्थ्य सर्वेक्षण और विकास समिति, जिसे भोर कमेटी के नाम से भी जाना जाता है, ने 1946 में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की थी। यह रिपोर्ट उस समय भारत की स्वास्थ्य योजना और इससे जुड़े कार्यक्रमों की रीढ़ समझी जाती रही थी। इसमें सभी स्तरों पर लोगों को रोगों से बचाव और उनके निदान पर जोर दिया गया था। इसमें एक प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र के विकास के लिए कम से कम दो डॉक्टरों और एक नर्स, चार सार्वजनिक स्वास्थ्य नर्स, चार परिचायिकाएं, चार प्रशिक्षित दाई, दो स्वच्छता निरीक्षक के साथ कुछ अन्य कर्मचारियों के नियुक्त करने का सुझाव भी दिया था। स्वच्छता से जुड़े इन निरीक्षकों से अपेक्षा की गई थी कि वे लोगों की स्वच्छता संबंधी आवश्यकताओं की चिंता करेंगे। लेकिन वस्तुस्थिति यह है कि इन प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों पर अभी भी इन निरीक्षकों की नियुक्ति नहीं हो पाई है।

कहने की आवश्यकता नहीं कि राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन (एनआरएचएम) शुरू होने तक देश में स्वच्छता को सार्वजनिक स्वास्थ्य का महत्त्वपूर्ण अंग नहीं समझा गया था। लेकिन फिर भी एनआरएचएम ने कुछ प्रयास करके गांवों में घरों के साथ सामुदायिक शौचालयों का निर्माण और पूर्ण स्वच्छता कार्यक्रम के मानकों के अनुसार सहायक ढांचागत सुविधा जुटाने का प्रयास किया। देखने में आ रहा है कि कई राज्यों में यह सुविधा अभी भी कमजोर स्थिति में है। यह सच है कि चाहे घरों के शौचालय हों या सार्वजनिक, सभी पानी की उपलब्धता के बिना काम नहीं कर सकते।

यह भी कड़वा सच है कि इन शौचालयों का प्रयोग तब तक नहीं हो सकता, जब तक इनकी साफ-सफाई ठीक से न हो। भारत में इस प्रकार की सुविधाओं के विस्तार के लिए धन की कोई खास व्यवस्था न होने के कारण इनका ठीक से कार्यान्वयन भी नहीं हो सका है। कई बार इस प्रकार की विकास योजनाओं में संसाधनों के दुरुपयोग या लोकशाही द्वारा इसका इनका प्रबंधन करने का आक्षेप लगता रहा है। समाज में जहां लोग सामूहिक सार्वजनिक स्वास्थ्य और स्वच्छता की वैज्ञानिक अवधारणा से सांस्कृतिक रूप से दूरी बनाए हुए हैं, वहां ऐसे समाजों में स्वच्छता से जुड़े कार्यक्रम और अभियान बहुत लाभ पहुंचा सकते थे। लेकिन दुर्भाग्य से यह कड़ी अभी टूटी हुई है।

देखने में आ रहा है कि देश में सांस्कृतिक वर्जना अभी भी अनेक घरों में शौचालयों के निर्माण में बाधा बनी हुई है। देश की आबादी जो अभी भी गरीबी रेखा से नीचे जीवन जीने को मजबूर है, उसमें भी शौचालयों के निर्माण और उनके संरक्षण में परेशानी आ रही है। स्वच्छता के मूल्यों का अभाव और समान होने की भावना सभी के लिए स्वच्छता के मुद्दों के विस्तार को बाधित कर रही है। नगर के साथ-साथ ग्रामीण स्थानीय निकाय लोगों को सार्वजानिक स्वास्थ्य सुविधाएं देने के लिए जिम्मेदार हैं। पर ये भी भारत के लोगों को सामूहिक रूप से स्वच्छता कार्यक्रम से जोड़ कर उन्हें गतिशील बनाने में कम ही सफल रहे हैं।

इसलिए कहने की आवश्यकता नहीं कि भारत में स्वच्छता से जुड़े लक्ष्यों को हासिल करने के लिए संकीर्ण दृष्टि से जुड़े कार्यक्रम अधिक सहायक नहीं हो सकते। भारत में समूह व समुदाय के स्तर पर अधिक शौचालयों के निर्माण के साथ-साथ मानसिक स्तर पर भी परिवर्तन लाने की महती आवश्कता है। शौचालय केवल एक भौतिक ढांचा न होकर एक सोच ज्यादा है। हमें जहां जरूरतमंदों के लिए शौचालयों के निर्माण पर बल देना है, वहीं उन शौचालयों का प्रयोग भी उनके द्वारा किया जाए, इस सोच को विकसित करने की जरूरत है।

 

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