उपग्रहों का विकल्प गुब्बारे

स्रोत: द्वारा विजन कुमार पांडेय: जनसत्ता

पिछले कुछ सालों में भारत ने अंतरिक्ष में लंबी छलांगें मारी हैं। इसरो ने भूस्थिर संचार उपग्रह जीसैट-7 ए को कक्षा में स्थापित कर दिया। यह उपग्रह वायु सेना की संचार प्रणाली को और मजबूत बनाएगा। इसके जरिए वायु सेना को भूमि पर रडार स्टेशन, एयरबेस और एयरबॉर्न वार्निंग एंड कंट्रोल सिस्टम से इंटरलिंकिंग की सुविधा मिलेगी। इसके जरिए नेटवर्क आधारित युद्ध संबंधी क्षमताओं में विस्तार होगा और वैश्विक अभियानों में दक्षता बढ़ेगी। यह उपग्रह ऐसे समय में प्रक्षेपित हुआ है, जब भारत अमेरिकन अत्याधुनिक किस्म के ड्रोन हासिल करने की प्रक्रिया में जुटा है।

इसके पहले भारत ने अब तक के सबसे वजनी उपग्रह जीसैट-11 को यूरोपीय स्पेस एजेंसी के प्रक्षेपण केंद्र फ्रेंच गुयाना से अंतरिक्ष में भेजा था। जीसैट-11 का वजन 5854 किलोग्राम है। यह उपग्रह पृथ्वी की सतह से छत्तीस हजार किलोमीटर ऊपर कक्षा में काम कर रहा है। जीसैट-11 कई मायनों में खास इसलिए है क्योंकि यह भारत में बना अब तक का सबसे भारी संचार उपग्रह है जो लंबे समय तक काम करेगा। इससे पूरे भारत में तेज इंटरनेट की सुविधा मिल सकेगी। दूरदराज के इलाकों में भी इंटरनेट की पहुंच बनेगी। भारत में कई ऐसी जगहे हैं, जहां फाइबर पहुंचाना आसान नहीं होता, वहां इस उपग्रह के जरिए इंटरनेट पहुंचाना आसान हो जाएगा। इसका एक और फायदा यह है कि जब कभी फाइबर को नुकसान होगा, तो इंटरनेट पूरी तरह बंद नहीं होगा और उपग्रह के जरिए काम करता रहेगा।

पहले जीसैट-11 को इसी साल मार्च-अप्रैल में भेजा जाना था, लेकिन जीसैट-6ए मिशन के नाकाम होने के बाद इसे टाल दिया गया। इसरो के पास करीब चार टन वजनी उपग्रह को भेजने की क्षमता है, लेकिन जीसैट-11 का वजन छह टन के करीब है। इसलिए इसे फ्रेंच गुयाना के यूरोपियन स्पेसपोर्ट से भेजा गया। वैसे इसरो अभी खुद भारी उपग्रह भेजने पर विचार नहीं कर रहा है, लेकिन कुछ साल बाद जब सेमी-क्रायोजेनिक इंजन तैयार हो जाएगा, तब ऐसा संम्भव हो पाएगा।

इसरो अपने जीएसएलवी-3 लांचर की वजन उठाने की क्षमता पर भी काम कर रहा है, ताकि भारी उपग्रहों को अंतरिक्ष में भेजा जा सके। जीसैट-11 का उद्देश्य भारत के मुख्य क्षेत्रों और आसपास के इलाकों में मल्टी-स्पॉट बीम कवरेज मुहैया कराना है। ये उपग्रह इसलिए इतना खास है कि यह एक साथ कई सारे स्पॉट बीम इस्तेमाल करता है, जिससे इंटरनेट स्पीड और कनेक्टिविटी बढ़ जाती है। यहां स्पॉट बीम का आशय ऐसे उपग्रह सिग्नल से है जो एक खास भौगोलिक क्षेत्र में केंद्रित करता है। बीम जितनी पतली होगी, पावर उतना ही ज्यादा होगी। ये उपग्रह पूरे देश को कवर करने के लिए बीम या सिग्नल को दोबारा इस्तेमाल करता है। इनसैट जैसे पारंपरिक उपग्रह ब्रॉड सिग्नल बीम को इस्तेमाल करती है, जो पूरे इलाके को कवर नहीं कर पाते।

सबसे पहले 1958 में रूस ने स्पुतनिक नाम के उपग्रह को अंतरिक्ष भेज कर दुनिया में तहलका मचा दिया था। आनन-फानन में अमेरिका ने भी अपनी स्पेस एजेंसी नासा का गठन किया। शीत युद्ध के दौरान चली अंतरिक्ष की दौड़ में आखिरकार अमेरिका ने रूस को मात दे दी। आज अंतरिक्ष में होड़ की बात करें, तो अमेरिका दुनिया की सबसे बड़ी ताकत बन चुका है। अंतरिक्ष में होड़ अब अलग ही पैमानों पर हो रही है। अब बड़े से बड़े उपग्रह प्रक्षेपित करने के बजाय गुब्बारों से अंतरिक्ष में नई छलांग लगाई जा रही है।

दरअसल गुब्बारे, अंतरिक्ष में बहुत काम के हो सकते हैं। धरती से करीब तीस किलोमीटर की ऊंचाई पर इन्हें स्थापित कर के संचार और निगरानी के साथ इंटरनेट सेवाएं देने का काम भी लिया जा सकता है। किसी उपग्रह के मुकाबले ये गुब्बारे बहुत सस्ते पड़ते हैं। जरूरत पड़ने पर मरम्मत के लिए इन्हें आसानी से वापस धरती पर भी लाया जा सकता है। अंतरिक्ष में गुब्बारे भेजने की शुरुआत नासा ने पचास के दशक में की थी। आज अमेरिकी एजेंसी गुब्बारों का इस्तेमाल वायुमंडलीय शोध में करती है। इससे धरती पर निगाह रखी जाती है और ब्रह्मांड से आने वाली किरणों का अध्ययन किया जाता है। कई गुब्बारे तो मशहूर सेंट पॉल के गिरजाघर से भी कई गुना बड़े हैं। अंतरिक्ष में भेजे जाने वाले ये गुब्बारे प्लास्टिक से बने होते हैं और इनकी मोटाई सैंडविच के बराबर होती है। इनमें हीलियम गैस भरी जाती है।

दरअसल गुब्बारों के साथ दिक्कत ये है कि यह अपनी जगह से उड़ कर दूसरी जगह जाने लगते हैं। हवा चूंकि अलग-अलग दिशाओं में चलती है, इसलिए गुब्बारा किसी भी दिशा में उड़ कर जा सकता है। लेकिन अब ऐसी तकनीक विकसित की जा रही है कि इन्हें अंतरिक्ष में स्थिर रखा जा सके। इसके लिए गूगल भी सक्रिय है। गूगल की अल्फाबेट कंपनी, अंतरिक्ष में गुब्बारों को भेजने के लिए ‘प्रोजेक्ट लून’ पर काम कर रही है। इसके तहत अल्फाबेट ने अंतरिक्ष में गुब्बारे भेज कर संचार सुविधाएं देने का काम शुरू कर दिया है।

गुब्बारों में ऐसी मशीनें लगाई जा रही हैं, जो हवा के रुख के हिसाब से इसकी ऊंचाई को घटा या बढ़ा सकती हैं। अभी पिछले साल प्रोजेक्ट लून के तहत प्यूर्टो रिको में करीब तीन लाख लोगों को इंटरनेट सुविधा गुब्बारों के जरिए मुहैया कराई गई थी। समुद्री तूफान मारिया की वजह से प्यूर्टो रिको में इंटरनेट सेवाएं देने वाले सिस्टम तबाह हो गए थे। इस परियोजना को दुनिया के दूसरे हिस्सों में लागू करने की तैयारी कर रही है।

गुब्बारों को अंतरिक्ष में भेज कर हम अनगिनत फायदे उठा सकते हैं। जैसे कि जंगल में लगी आग पर निगरानी रखी जा सकती है। तूफानों का पता लगाया जा सकता है। समंदर में डकैती पर निगरानी रखी जा सकती है। फसलों की सेहत पर नजर रखी जा सकती है। आज से तीन चार साल पहले ये लक्ष्य ख्वाब सरीखे लगते थे। लेकिन आज हकीकत बन चुके हैं। मौजूदा स्ट्रैटोलाइट गुब्बारे पचास किलो वजनी मशीनें अपने साथ ले जा सकते हैं। इनमें सौर बैटरियां लगी होती हैं, जिससे ये कई साल तक काम कर सकते हैं। अब तो इनसे भी बड़े गुब्बारे बनाने की तैयारी है। बड़े गुब्बारों की मदद से अंतरिक्ष में सैलानियों को भी सैर के लिए भेजा जा सकेगा। इसी तकनीक से दूर-दराज के इलाकों तक किसी आपदा के दौरान मदद भी पहुंचाई जा सकती है।

अंतरिक्ष गुब्बारों की दुनिया में अमेरिकी कंपनियों को चीन से कड़ी टक्कर मिल रही है। चीन भी अंतरिक्ष में गुब्बारे भेज कर जासूसी करता है। चीन की कंपनी कुआंगशी साइंस की स्थापना 2010 मे शेनजान में हुई थी। ये गुब्बारों से बनी एयरशिप को अंतरिक्ष में भेज कर संचार सुविधाएं मुहैया कराती है। आजकल ये कंपनी सैलानियों के लिए गुब्बारे विकसित कर रही हैं। पिछले साल इस कंपनी ने एक गुब्बारा अंतरिक्ष में भेजा था जिसमें एक कछुआ था। ऐसे गुब्बारे रिमोट सेंसिंग तकनीक और दूरसंचार सुविधाओं से सुसज्जित होंगें।

किसी उपग्रह के मुकाबले ऐसे संचार गुब्बारे दस से सौ गुने तक सस्ते पड़ते हैं। उम्मीद है कि 2021 तक एक लाख डॉलर में अंतरिक्ष की सैर करने का लोगों का सपना साकार हो सकेगा। अंतरिक्ष गुब्बारों से छोटे रॉकेट और छोटे-छोटे शोध उपग्रह भी छोड़े जा सकेंगे। इनकी मदद से भविष्य में ड्रोन भी उड़ाए जा सकेंगे। अंतरिक्ष में कम ऊंचाई वाली दौड़ बहुत तेज हो चुकी है। फिलहाल तो अमेरिका इस में सब से आगे है। मगर, चीन भी ज़्यादा पीछे नहीं। भारत को भी इस दिशा में कदम बढ़ाने होंगे।

आज अंतरिक्ष में होड़ की बात करें, तो अमेरिका दुनिया की सबसे बड़ी ताकत बन चुका है। अंतरिक्ष में होड़ अब अलग ही पैमानों पर हो रही है। अब बड़े से बड़े उपग्रह प्रक्षेपित करने के बजाय गुब्बारों से अंतरिक्ष में नई छलांग लगाई जा रही है। दरअसल गुब्बारे, अंतरिक्ष में बहुत काम के हो सकते हैं। धरती से करीब तीस किलोमीटर की ऊंचाई पर इन्हें स्थापित कर के संचार और निगरानी के साथ इंटरनेट सेवाएं देने का काम भी लिया जा सकता है। किसी उपग्रह के मुकाबले ये गुब्बारे बहुत सस्ते पड़ते हैं।

 

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