पारदर्शिता की गिरती साख

स्रोत: द्वारा संजय ठाकुर: जनसत्ता

सरकारी और प्रशासनिक पारदर्शिता के संबंध में भारत की लगातार गिरती वैश्विक रैंकिंग ने देश में सूचना का अधिकार कानून के पालन को लेकर एक बार फिर सवाल खड़े कर दिए हैं। देश की रैंकिंग नीचे गिर कर अब छठे स्थान पर पहुंच गई है, जबकि पिछले वर्ष भारत पांचवें स्थान पर था। सूचना का अधिकार कानून के क्रियान्वयन में बरती गई लापरवाहियों और व्याप्त भ्रष्टाचार का ही नतीजा है कि सरकारी व प्रशासनिक पारदर्शिता में वैश्विक स्तर पर भारत की साख गिरी है।

सेंटर फॉर लॉ एंड डेमोक्रेसी, कनाडा और स्पेन की संस्था एक्सेस इन्फो, यूरोप ने बीते दिनों सरकारी व प्रशासनिक पारदर्शिता को लेकर सूचना का अधिकार कानून लागू करने वाले सभी देशों की रैंकिंग जारी की थी। इसमें भारत को पिछले साल की अपेक्षा नुकसान उठाना पड़ा। दिलचस्प बात तो यह है कि जिन देशों को भारत से ऊपर स्थान मिला है, उनमें ज्यादातर देशों ने भारत के बाद इस कानून को लागू किया है। ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल इंडिया ने भी अपनी रिपोर्ट में भारत की वैश्विक रैंकिंग गिरने का जिक्र किया है। देश में पारदर्शिता और भ्रष्टाचार से जुड़े मुद्दों की निगरानी करने वाली इस संस्था ने सूचना का अधिकार कानून से जुड़ी तीन महत्त्वपूर्ण धाराओं 25(2), 19(1) और 19(2) पर केंद्रित देश में इस कानून के पालन को लेकर चौंकाने वाली बातें उजागर करते हुए रिपोर्ट पेश की है।

दुनिया के एक सौ तेईस देशों में जारी इस कानून को भारत में जहां ‘सूचना का अधिकार’ नाम से जाना जाता है, वहीं दुनिया के कई देशों में इसे ‘राइट टु नो’ के रूप में जानते हैं। वैश्विक स्तर पर राइट टु नो के तहत जारी रैंकिंग में भारत से कहीं छोटा देश अफगानिस्तान पहले स्थान पर है। अफगानिस्तान ने कुल एक सौ पचास में एक सौ उनतालीस अंकों के साथ मैक्सिको को पीछे छोड़ दिया है। इसमें यह बात ध्यान देने योग्य है कि अफगानिस्तान ने सूचना का अधिकार कानून भारत के नौ साल बाद बनाया था। भारत में यह कानून वर्ष 2005 में लागू किया गया था, जबकि अफगानिस्तान में यह वर्ष 2014 में अस्तित्व में आया। यहां तक कि भारत से ग्यारह साल बाद सूचना का अधिकार कानून बनाने वाला श्रीलंका भी एक सौ इकतीस अंकों के साथ इस रैंकिंग में भारत से आगे है। इन देशों ने सूचना का अधिकार कानून भारत से काफी बाद में बनाया, लेकिन जनता के लिए सूचनाओं की सहज और सामान्य उपलब्धता और बेहतर कानून बनाने के कारण ये सरकारी व प्रशासनिक पारदर्शिता में भारत से आगे निकल गए।

वैश्विक स्तर पर सरकारी व प्रशासनिक पारदर्शिता से संबंधित वर्ष 2018 की इस रैंकिंग के अनुसार अफगानिस्तान के बाद मैक्सिको दूसरे, सर्बिया तीसरे, श्रीलंका चौथे और स्लोवेनिया पांचवें स्थान पर है। इस सूची में एक सौ अट्ठाईस अंकों के साथ भारत का छठा स्थान है। चोटी के दस देशों में भारत से नीचे अब अल्बानिया, क्रोएशिया, लाइबेरिया और अल सल्वाडोर ही रह गए हैं। सेंटर फॉर लॉ एंड डेमोक्रेसी की रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2011 में भारत एक सौ तीस अंकों के साथ दूसरे स्थान पर था। उस समय इस सूची में सर्बिया का पहला स्थान था। वर्ष 2012 में भी भारत की रैंकिंग उसी स्तर पर कायम रही। लेकिन वर्ष 2014 के बाद से भारत की रैंकिंग लगातार गिर रही है। वर्ष 2014 में एक सौ अट्ठाईस अंकों के साथ भारत तीसरे स्थान पर खिसक गया। वर्ष 2016 में भारत इससे भी नीचे चौथे स्थान पर चला गया। वर्ष 2017 में भारत पांचवें स्थान पर आ गया और अब 2018 में भारत छठे स्थान पर आ गया है।

सेंटर फॉर लॉ एंड डेमोक्रेसी आरटीआइ लागू करने वाले सभी देशों के कानूनों और उनके पालन की हर वर्ष समीक्षा करती है। वैश्विक रैंकिंग सूचना तक पहुंच, कानून का दायरा, आवेदन की सहज प्रक्रिया, सूचना की परिधि से संस्थाओं को छूट, अपील की प्रक्रिया, विभिन्न प्रकार की मंजूरी और संरक्षण और कानून का प्रचार-प्रसार जैसे पैमानों पर जारी की जाती है। ऐसे देश जिनका कानून ज्यादा मजबूत होता है, जहां मंत्रालय और सरकारी विभाग छुपाने की बजाय ज्यादा से ज्यादा सूचनाएं जनता के लिए उपलब्ध रखते हैं, जहां सूचना का अधिकार कानून के अंतर्गत आवेदन से पहले ही सरकारी संस्थाओं की ओर से जरूरी सूचनाएं वेबसाइट पर उपलब्ध रहती हैं, उन देशों की रैंकिंग ज्यादा मजबूत होती है।

भारत में सरकारी व प्रशासनिक स्तर पर सूचनाएं छुपाने का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि यहां सूचनाएं उपलब्ध न करवाने पर सूचना का अधिकार कानून बनने से अब तक अठारह लाख से ज्यादा लोग सूचना आयोगों का दरवाजा खटखटा चुके हैं। गोपनीयता और निजता का हवाला देकर ऐसी सूचनाओं को भी बाहर आने से रोका जाता है जिनसे न तो राष्ट्रीय सुरक्षा को कोई खतरा होता है और न ही किसी व्यक्ति की निजता भंग होती है। सूचनाओं को रोकने के लिए संबंधित अधिकारी सूचना का अधिकार कानून के कुछ उपबंधों को अक्सर ढाल बनाते हैं।

भारत में सूचना का अधिकार तो लागू हो गया, लेकिन सरकारी व प्रशासनिक तंत्र में बैठे प्रभावशाली लोगों की मानसिकता में कोई बदलाव न आने से इस कानून के लागू होने के तेरह साल बाद भी इसके क्रियान्वयन में बड़ी दिक्कतें आ रही हैं। ऐसे लोग सूचनाएं उपलब्ध करवाने की बजाय उन्हें छुपाते में विश्वास रखते हैं। सूचनाएं उपलब्ध न करवाने के पीछे यह तर्क भी नहीं रह जाता कि सूचना का अधिकार कानून के तहत चाही गई ज्यादातर सूचनाएं अर्थहीन हैं। पहली बात तो यह कि सूचनाएं अर्थहीन हैं या नहीं, यह निर्धारित करना जन सूचना अधिकारी का काम नहीं है और दूसरी बात यह कि आंकड़ों से पता चलता है कि इस कानून के अंतर्गत अर्थहीन अर्जियों की संख्या दो प्रतिशत ही रही है। इसके बावजूद संबंधित अधिकारियों ने सूचना देने में कोताही बरती है।

इस तरह से भारत में सूचना का अधिकार कानून एक तरह से प्रभावहीन है। सूचना पाने के इच्छुक व्यक्ति को पहले तो महीनों तक जवाब नहीं दिया जाना और फिर वांछित जानकारी देने से बचने के लिए सूचना का अधिकार कानून के अनुच्छेदों की निहायत ही गलत ढंग से व्याख्या करने की प्रवृत्ति चलन में है। देशभर में सूचना का अधिकार कानून के साथ किस तरह से मजाक हो रहा है इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि सरकार के सचिवों तक से चाही गई जानकारी दस-दस महीने बीत जाने के बाद भी नहीं मिल पाती। इससे सरकार के गंभीर विषयों के प्रति रवैए का भी पता चलता है।

सूचना का अधिकार कानून के अंतर्गत मांगी गई सूचना को उपलब्ध न करवाने के लिए संबंधित अधिकारी कानून के अंतर्गत तो दंड के भागी हैं। ऐसे दोष के लिए कानून के स्तर पर तो सजा निश्चित है, लेकिन विभागीय स्तर पर इसके लिए सजा दी ही जाएगी, यह सुनिश्चित किया जाना भी जरूरी है। दरअसल, ऐसे अधिकारियों को अपने काम में कोताही की छूट सरकारी या विभागीय स्तर पर मिली ‘छूट’ से ही मिलती है। ऐसे में व्यवस्था का चल पाना ही मुश्किल है तो फिर उसमें पारदर्शिता का क्या महत्व रह जाता है! व्यवस्था को पारदर्शी बनाना सूचना का अधिकार कानून का एक मुख्य उद्देश्य है, लेकिन सरकारी व प्रशासनिक तंत्र के ढुलमुल रवैये से इस कानून का क्या औचित्य रह जाता है!

 

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