मजबूत कानून की दरकार

स्रोत: द्वारा पी ऍम नायर: राष्ट्रीय सहारा

लोकसभा ने ट्रैफिकिंग ऑफ पर्सन्स (प्रीवेंशन, प्रोटेक्शन एंड रीहैबिलिटेशन) बिल, 2018 को जुलाई में ही पास कर दिया था। यह राज्य सभा से पास होना बाकी है। वहां भी यह पारित हो जाता है तो ट्रैफिकिंग जैसे संगठित अपराध पर प्रभावी रोक के साथ-साथ अपराधों के खिलाफ सख्त कार्रवाई को यह हथियार साबित होगा। यह वही बिल है जिसे सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर तैयार किया गया है। मानवाधिकारवादी दशकों से ऐसी व्यवस्था की मांग कर रहे थे।

पहली बार होने जा रहा है जब ट्रैफिकिंग से छुड़ाए पीड़ितों के राहत एवं पुनर्वास की जरूरत को सही मायने में रेखांकित किया गया है। राहत एवं पुनर्वास में ‘‘कल्याण’ का भाव नहीं है, बल्कि ‘अधिकार’ का भाव है। बिल इस बात को पूरी तरह स्पष्ट करता है कि पीड़ितों का जो पुनर्वास होगा वह अभियुक्त के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई शुरू करने या मुकदमे के फैसले पर निर्भर नहीं होगा। बिल की यह एक अन्य विशेषता है जो पीड़ितों की गरिमा के अधिकार की रक्षा करने की गारंटी देता है। बिल पुनर्वास एजेंसियों की जिम्मेदारी की जरूरत पर भी बल देता है। अभी तक मौजूदा कानून पुलिस को ही इसकी जिम्मेदारी देता आ रहा था कि पीड़ितों को छुड़ाए। लेकिन अब यह जिम्मेदारी उन पुनर्वास एजेंसियों की भी होगी जिन्हें अब तक इस जद से बाहर रखा गया था।

यह कानून उन पीड़ितों को अपना पक्ष प्रस्तुत करने के लिए बेहतर माहौल उपलब्ध कराएगा, जिनका पुनर्वास किया जाएगा या जिनको परामर्श की सुविधा उपलब्ध कराई जाएगी। इस तरह प्रभावी और समयबद्ध न्यायिक प्रक्रिया ट्रैफिकिंग जैसे अपराध की रोकथाम की दिशा में वरदान साबित होगा। पीड़ितों और गवाहों की देखभाल के दृष्टिकोण से जो प्रावधान किए गए हैं, वे कानून के राज को सुनिश्चित करने में मदद करेंगे। राष्ट्रीय, राज्य और जिलास्तरीय पुनर्वास कमेटियों की स्थापना के लिए बिल में जो प्रावधान किए गए हैं, वे पुनर्वास प्रक्रिया की निगरानी की दिशा में गंभीर कदम हैं।

अब तक सिविल सोसायटी के लिए यह कठिन काम था, जिसके तहत उन्हें पीड़ितों को राहत प्रदान करने के लिए सरकारी संस्थाओं के दरवाजे खटखटाने पड़ते थे। कानून का यह नया आयाम पूरी जांच प्रक्रिया को आसान बनाएगा। दूसरी ओर, ट्रैफिकिंग जैसे संगठित आर्थिक अपराध रोकने के लिए हरेक जिले में विशेष अदालत का गठन किया जाएगा और निश्चित अवधि में इस पर सुनवाई करते हुए ट्रैफिकर के लिए सख्त सजा का प्रावधान करेगा। ट्रैफिकिंग के दोषी पाए जाने वाले व्यक्ति को सश्रम कारावास और कम से कम एक लाख रुपये का जुर्माना भरना होगा।

राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ट्रैफिकर्स का गठजोड़ तोड़ने के लिए उनकी संपत्ति की कुर्की-जब्ती होगी। उनके बैंक खातों को भी जब्त किया जाएगा। यह कानून संगठित अपराध को निष्प्रभावी बनाने के लिए अंतर-राज्यीय और अंतरराष्ट्रीय सहयोग की जरूरत पर बल देता है। सीमा पार से होने वाले आर्थिक, राजनीतिक और आपराधिक गठजोड़ को खत्म करेगा। नारकोटिक्स ब्यूरो राज्य पुलिस के साथ काम करता है, और दोनों के पास अपने-अपने क्षेत्राधिकार हैं। ऐसा ही राष्ट्रीय जांच ब्यूरो के साथ भी होगा। इससे पहले मानव दरुव्यापार पर लगाम कसने के लिए देशभर में 2007 में एंटी ह्यूमन ट्रैफिकिंग यूनिट्स (एएचटीयू) की स्थापना की गई थी। इसे सबसे पहले गृह मंत्रालय और संयुक्त राष्ट्र की संयुक्त परियोजना के तहत 9 जिलों में शुरू किया गया था। बाद में 300 से अधिक जिलों में भी इसे लागू किया गया।

राज्यों में नोडल अधिकारी और नोडल पुलिस अधिकारियों की पण्राली, राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के तहत 2005 में शुरू की गई। नोडल पण्राली ट्रैफिकिंग को रोकने और उससे मुकाबला करने में हरेक तरह से महत्त्वपूर्ण है। यह बिल नोडल पण्राली को कानूनी स्थिति भी प्रदान करता है। लिहाजा, कानून एजेंसियों द्वारा राष्ट्रीय जांच ब्यूरो का स्वागत किया जाना चाहिए। ट्रैफिकिंग के मामले में उत्पीड़कों, ट्रांसपोर्टरों, फाइनेंसरों, दुर्व्यवहारियों, शोषकों, षडय़ंत्रकारियों आदि के खिलाफ अभियोग तय करना मुश्किल काम रहा है। इसके कई कारण हैं। उनमें से सभी को कानून के माध्यम से संबोधित भी नहीं किया जा सकता। लेकिन नया बिल संगठित अपराध और अपराधियों के जड़ मूल नाश में सकारात्मक और संभावित प्रयास करता है।

बच्चों, महिलाओं और शारीरिक या मानसिक रूप से विकलांगों के खिलाफ अपराधों के संबंध में उनकी शिकायतों का तेज, आसान और कुशल निपटान सुनिश्चित करने के लिए बिल पर्याप्त अवसर प्रदान करता है। राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ट्रैफिकर्स के गठजोड़ को तोड़ने के लिए उनकी संपत्ति की कुर्की-जब्ती होगी। उनके बैंक खाते भी जब्त किए जाएंगे। यह सीमा पार से होने वाले आर्थिक, राजनीतिक और आपराधिक गठजोड़ को खत्म करता है। गौरतलब है कि आईपीसी या आईटीपीए की धारा 370 में ऐसा कोई प्रावधान नहीं था। बिल निश्चित ही मौजूदा कानूनों में सुधार है, जिसमें आईपीसी की धारा 370 शामिल है, जिसे 2013 में लागू किया गया था।

आईपीसी की यह धारा ट्रैफिकिंग को तो परिभाषित करती है लेकिन जबरिया और बंधुआ मजदूरी पर चुप है। मौजूदा बिल में जबरिया और बंधुआ मजदूरी, सरोगेसी, झूठी शादी, भीखमंगी को एग्रीवेटेड फॉर्म्स ऑफ ट्रैफिकिंग में शामिल किया गया है, और इनको अंजाम देने वाले अपराधियों के लिए ज्यादा से ज्यादा सजा के प्रावधान हैं। उल्लेखनीय है कि देश में शोध को विधायी प्रक्रिया से कभी भी नहीं जोड़ा गया। यह बात अलग है कि इस पद्धति को कई देशों में अपनाया गया है। शोध से संबंधित तय यह है कि यह बिल कमियों या गैप को भरने में हमारी मदद करता है, और समाधान की दिशा में इससे समस्याओं की पहचान होती है।

इस संदर्भ में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने 2002-2004 में ट्रैफिकिंग पर राष्ट्रीय शोध किया था। फलस्वरूप 2005 में जो रिपोर्ट आई, सरकार ने उसे अपनाया। उसके आधार पर कई सुझाव लागू किए। गौरतलब है कि बिल में इस तय की सराहना की गई है कि किसी भी कार्रवाई से पहले शोध करने की महती आवश्यकता है। इसलिए प्रस्तावित बिल भारत में ट्रैफिकिंग को रोकने की दिशा में मजबूत कदम है, और इसके लिए संवैधानिक जनादेश की जरूरत है।

 

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