विलय की कहानी

स्रोत: द्वारा के.सी. त्यागी: राष्ट्रीय सहारा

अगस्त 1947 में भारत से अंग्रेजों की विदाई के साथ ही रियासतों के समक्ष भारत या पाकिस्तान में विलय संबंधी निर्णय लेने की चुनौतीपूर्ण स्थिति उत्पन्न हो चुकी थी। 3 जून 1947 को घोषित ‘‘माउंटबेटेन प्लान’ के तहत स्पष्ट हो चुका था कि भारतीय रियासतों पर ब्रिटिश स्वामित्व समाप्त होकर इन रियासतों को भारत या पाकिस्तान किसी एक में शामिल होना होगा।

ब्रिटिश संसद द्वारा भारत और भावी पाकिस्तान को 15 अगसत 1947 तक सत्ता हस्तनांतरित करने के लिए ‘‘इंडियन इंडीपेंडेंस एक्ट’ के तहत रियासतों की विलय प्रक्रिया शुरू हुई। 15 अगस्त तक अधिकांश राजाओं द्वारा भारतीय संघ में शामिल होने की घोषणा हो चुकी थी, लेकिन कुछ राजा पाकिस्तान में शामिल होने का मंसूबा पाले बैठे थे। कश्मीर के महाराजा, हैदराबाद के निजाम और जूनागढ़ के नवाब द्वारा अब तक किसी भी संघ में विलय नहीं किया गया था।

हरि सिंह द्वारा अब तक भारत में शामिल नहीं होने के निर्णय से आशंका यह भी बन रही थी कि वह पाकिस्तान में भी विलय चाहते हों। प्रांतीय सरकार द्वारा पाकिस्तान के साथ ‘‘स्टैंड स्टील एग्रीमेंट’ के बाद ऐसे कयास और तेज होने लगे थे। ब्रिटिश भारतीय शासन द्वारा तैयार किए गए इस एग्रीमेंट के तहत रियासतों द्वारा किसी भी संघ में विलय की अवधि तक सार्वजनिक क्षेत्र के सभी प्रशासनिक व्यवस्थाएं हूबहू लागू रखने का प्रावधान था, जिसे भारत ने ठुकरा दिया और पाकिस्तान ने बिना कोई देरी किए स्वीकार कर लिया।

भौगोलिक-आर्थिक कारणों से भी कश्मीर का पाकिस्तान में मिलने की संभावनाएं चिंताएं बढ़ा रही थीं। निश्चित ही कश्मीर के अहम भौगोलिक संचार माध्यम और आर्थिकी संपर्क पश्चिमी पंजाब और उत्तर-पश्चिम के सीमांत राज्यों से जुड़े थे, जो विभाजन के बाद पाकिस्तान में थे। उस समय की एकमात्र रेल लाइन जो जम्मू-कश्मीर को जोड़ती थी, उत्तर-पश्चिम रेलवे की ही लिंक लाइन थी। पाकिस्तान में विलय की घोषणा में देरी के कारण कश्मीर को पेट्रोल, गेहूं और नमक जैसी आवश्यक सामग्री की आपूर्ति में बाधा भी झेलनी पड़ी।

ऐसे तमाम हथकंडों से पाकिस्तान दबाव बनाकर कश्मीर को अपने में शामिल कराने का हरसंभव प्रयास करता रहा। हरि सिंह के ढुलमुल रवैये से भी पाक के मंसूबों को बल मिलता रहा। अंतत: 22 अक्टूबर 1947 को पाकिस्तान समर्थित कबायलियों द्वारा जम्मू-कश्मीर पर किए गए हमले से अपनी और राज्य के बचाव के मद्देनजर राजा हरि सिंह ने 27 अक्टूबर 1947 को भारतीय संघ में कश्मीर के विलय की घोषणा कर दी। इसी सुबह पहले सिख रेजीमेंट के लगभग 300 सैनिकों द्वारा श्रीनगर पहुंचकर पाकिस्तानी घुसपैठियों पर काबू पाने की तेज कार्रवाई कर हवाई अड्डा परिसर को अपने कब्जे में किया गया।

इस लड़ाई में स्वयं कश्मीरी भी पाकिस्तानी घुसपैठियों का मुकाबला कर रहे थे। कहा जाता है कि एक घंटे की देरी भी भारतीय सेना के लिए बड़ी मुसीबत बन सकती थी। विभाजन की आग में कई जगहों पर धर्म आधारित हिंसक घटनाएं सामाजिक सौहार्द बिगाड़ रही थीं। महत्त्वपूर्ण है कि आज सात दशक बाद भी कश्मीर-विवाद एक ज्वलंत विषय बना हुआ है। इस स्थिति में बड़ा सवाल है कि इस विवाद का निपटारा अब तक क्यों नहीं हो पाया? अलगाववाद, उग्रवाद और अब आतंकवाद की चपेट में कश्मीर क्यों झुलस रहा है? ऐसे तमाम सवालों के जवाब में ऐतिहासिक तयों की भूमिका अहम है।

1846 में ईस्ट इंडिया कंपनी के एजेंटों द्वारा जम्मू-कश्मीर को राजा गुलाब सिंह को लगभग 70 लाख नानकशाही रूप में बेच दिया गया था, जिसका तत्कालीन गवर्नर शेख इमामुद्दीन द्वारा विरोध भी हुआ था। अमृतसर संधि के तहत जम्मू-कश्मीर पर गुलाब सिंह के स्वामित्व और संधि की राजनीतिक-नैतिक स्थितियों को कश्मीरी नेताओं द्वारा कई अवसरों पर चुनौती भी मिलती रही है। उनके अनुसार इस संधि में कश्मीरियों को पार्टी नहीं बनाया जाना असंतोष की जड़ बनी।

सन् 1925 में हरि सिंह कश्मीर के राजा बने। दूसरी ओर 1932 में शेख अब्दुल्ला ने ‘‘मुस्लिम कांफ्रेंस’ की स्थापना कर अधीनस्थ मुसलमानों के अधिकारों के हिमायती के रूप में घाटी से प्रांतीय शासन समाप्त करने का मोर्चा संभाल लिया था। गांधीजी के आह्वान पर शेख अब्दुल्ला की मुस्लिम कांफ्रेंस को नेशनल कांफ्रेंस बनाकर इसे न केवल मुस्लिम हिमायत की पहचान तक सीमित रखा बल्कि प्रांतीय शासकों के खिलाफ उनकी लड़ाई में राज्य हित के मुद्दे भी शामिल किया।

पंडित नेहरू से करीबी के बाद शेख की राजनीति पहले से ज्यादा मुखर हो गई। 1946 में अब्दुल्ला ने ‘‘कश्मीर-छोड़ो’ आंदोलन से शक्ति प्रदर्शन भी किया, जिसके बाद उनकी गिरफ्तारी भी हुई। शेख के प्रति नेहरू की संवेदनशीलता का अंदाजा इस घटना से भी लगाया जा सकता है कि जून 1946 में उन्हें रिहा कराने के लिए नेहरू ने कश्मीर जाने की घोषणा कर दी थी। कुल मिलाकर, भारत की धर्मनिरपेक्षता, कश्मीरियत में नेहरू और शेख अब्दुल्ला का विश्वास और अंतत: हरि सिंह की मजबूरी के बीच जम्मू-कश्मीर भारतीय संघ का अंग बन गया।

अन्य राज्यों के मुकाबले जम्मू-कश्मीर को विशेष अधिकार देने वाले अनुच्छेद 370 के तहत भारतीय संसद को सिर्फ रक्षा, विदेश मामले और संचार से संबंधित कानून बनाने का अधिकार प्राप्त रहा है। इसकी आत्मा कही जाने वाली धारा 35ए वहां के नागरिकों को विशेष अधिकार देता है। मसले की नाजुकता के बावजूद आए दिन धारा 370 को समाप्त करने की राजनीतिक वकालत होती रही है। देश के एकीकरण में सरदार पटेल के योगदान प्रशंसनीय हैं।

1946 के कैबिनेट मिशन की प्रस्तावित योजना के तहत पूरा बंगाल, पंजाब और असम पाकिस्तान का हिस्सा बनने जा रहा था। दूरदर्शी पटेल ने प्रस्तावना का कड़े शब्दों में विरोध करते हुए कहा, ‘‘यह प्रस्ताव तो पाकिस्तान बनाने के प्रस्ताव से भी ज्यादा खराब है।’ बाद में एक बार फिर से 20 फरवरी 1947 को एटली नीति के तहत पंजाब, बंगाल और असम जिन्ना के खाते में डाले जाने का प्रस्ताव रखा गया। दोबारा लाए गए इस प्रस्ताव को सिरे से ठुकराते हुए पटेल ने पंजाब और बंगाल के विभाजन का प्रस्ताव पेश कर दिया और पूरा असम भारत का हिस्सा बना। सच भी है कि यदि राजा 15 अगस्त 1947 को अपनी हठधर्मिता त्यागकर भारत में विलय कर दिया होता तो समस्या पैदा ही नहीं होती। नि:संदेह, कश्मीर मसले को संयुक्त राष्ट्र में ले जाने जैसी कवायद पंडित नेहरू की बड़ी चूक थी। 31 अक्टूबर को लौह पुरुष की जयंती पर उनका स्मरण राष्ट्रीय एकता के संकल्पों की याद दिलाता है।

 

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