पीछे की ओर ले जाएगा प्रोजेक्ट सशक्त

स्रोत: द्वारा देवाशिष बसु: बिज़नेस स्टैण्डर्ड

अब तो लोग यह गिनती भी भूल चुके होंगे कि कॉर्पोरेट दिवालिया मामलों से निपटने के लिए सरकार अब तक कितनी सरकारी समितियां गठित कर चुकी है। सन 1964 से 2013 के बीच नौ बड़ी समितियों का गठन किया गया। इसके अलावा समय-समय पर कई छोटी समितियां भी गठित की गईं। पंजाब नैशनल बैंक के चेयरमैन सुनील मेहता की अध्यक्षता वाली ऐसी ही एक अन्य समिति ने अपनी रिपोर्ट ऊर्जावान अंतरिम वित्त मंत्री पीयूष गोयल को सौंपी। गोयल ने इसे 'प्रोजेक्ट सशक्त' का नाम दिया।

कोई भी व्यक्ति जिसे फंसे हुए कर्ज से जुड़ी परिस्थितियों की जानकारी हो और जो वित्तीय तंत्र पर व्यापक सरकारी नियंत्रण के बारे में जानता है, वह इस बात को समझता होगा कि केवल समिति की अनुशंसाओं के दम पर फंसे हुए कर्ज की मात्रा कम करने या नए फंसे हुए कर्ज को रोकने में कोई खास मदद नहीं मिल सकती। निश्चित तौर पर ऐसी तमाम नई कोशिशें मौजूदा प्रक्रियाओं को लेकर भ्रम पैदा करेंगी और वास्तव में फंसे हुए कर्ज के निपटान को और अधिक मुश्किल बनाएंगी।

इस योजना के तहत 50 करोड़ रुपये अथवा कम के फंसे हुए कर्ज के लिए बैंकों को इसकी जानकारी होने के 90 दिन के भीतर निस्तारण की योजना तैयार करनी होगी। इस बारे में कोई स्पष्ट जानकारी नहीं है कि यह सब पिछले चार दशकों के दौरान सरकार द्वारा फंसे हुए कर्ज से निपटने के लिए बनाई गई योजनाओं से किस तरह अलग होगा। लेकिन एक बात तो साफ है कि यह भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा गत फरवरी में जारी किए गए एक परिपत्र का अवमूल्यन करता है। उस परिपत्र में रिजर्व बैंक ने बैंकों से कहा था कि वे किसी कर्ज फंसे हुए कर्ज में तब्दील होने के 91वें दिन आरबीआई को जानकारी दें। अगर प्रोजेक्ट सशक्त के अंतर्गत बैंक फंसे हुए कर्ज के मामले का 90 दिन में निस्तारण करने जा रहे हैं तो 91वें दिन आरबीआई को जानकारी देने का कोई तुक नहीं बनता। निश्चित तौर पर कुछ मीडिया रिपोर्ट के अनुसार समिति ने तो यह सुझाव तक दिया है कि बैंकों को देनदारी में चूक करने वालों को अतिरिक्त ऋण भी दिया जाना चाहिए।

चूंकि सरकारी बैंकों में फंसे हुए कर्ज के अधिकांश मामले या तो अक्षमता की वजह से उपजे हैं या भ्रष्टाचार से, ऐसे में आपको आश्चर्य हो सकता है कि वास्तविक लक्ष्य क्या है।  समिति की अनुशंसा के मुताबिक 50 करोड़ रुपये से 5 अरब रुपये के बीच के फंसे हुए कर्ज के मामले में प्रमुख कर्जदार को कमान संभालनी होगी और 180 दिनों के भीतर निस्तारण की योजना प्रस्तुत करनी होगी। इसके लिए बैंकों को अंतर ऋणदाता समझौता करना होगा। ये सारी बातें उम्मीद पर आधारित हैं। यह नीति नहीं है। निस्तारण की प्रक्रिया में धीमापन इसलिए भी आता है क्योंकि कर्जदारों के बीच में सहमति नहीं बन पाती।

ऐसे में प्रमुख ऋणदाता के कमान संभालने से कोई खास अलग नतीजा नहीं हासिल होगा। सबसे बुरी बात तो यह है कि समिति की अनुशंसाएं केवल निस्तारण प्रकिया को बिगाडऩे और उसमें देरी करने का कारण बनेंगी। आखिरकार ऋणशोधन अक्षमता एवं दिवालिया संहिता (आईबीसी) के अधीन बैंकों से पहले ही यह उम्मीद की जा रही है कि वे किसी कर्ज के फंसे हुए कर्ज में तब्दील हो जाने के बाद वे तत्काल कार्रवाई करेंगे और फिर ऋणदाता समिति के जरिये इस पर मतदान होगा। सवाल यह है कि बैंकों और डिफॉल्टरों को 180 दिन का और समय क्यों? आखिर यह अनुशंसा किस तरह आईबीसी के कद से मेल खाती है? इन सबके बीच फंसे हुए कर्ज को लेकर आरबीआई के विभिन्न दिशानिर्देश कहां ठहरते हैं?

समिति कहती है कि जिस फंसे हुए कर्ज की परिसंपत्ति का मूल्य 5 अरब रुपये से अधिक हो उनका प्रबंधन परिसंपत्ति प्रबंधन कंपनियों के द्वारा किया जाएगा। इनका वित्त पोषण बैंकों, विदेशी फंडों, बुनियादी निवेश फंड आदि से किया जाएगा। यह समझदारी भरी सोच है। जरा कल्पना कीजिए कि कैसे निजी क्षेत्र की कई परिसंपत्ति पुनर्गठन कंपनियां पहले से मौजूद हैं। फंसे कर्ज के मामले में ऐसी 24 विशिष्ट कंपनियां पहले से आरबीआई के पास पंजीकृत हैं। उनमें से कुछ का विदेशी कंपनियों के साथ संयुक्त उद्यम है। आखिर भारत को ऐसी अन्य कंपनियों की क्या आवश्यकता है? क्या केवल इसलिए क्योंकि नेता और बाबू देश में कुछ नया होता दिखाना चाहते हैं? इसके लिए पैसा कहां है? चूंकि सरकार चाहती है इसलिए नई कंपनियों का गठन भी जीवन बीमा निगम और सरकारी बैंकों के पैसे से किया जाएगा, भले ही यह बेकार हो जाए। सरकार के रुख को देखते हुए हिंदुस्तान पेट्रोलियम जैसी अमीर सरकारी कंपनियों से भी कहा जा सकता है कि वे राष्ट्र हित में एएमसी में योगदान दें।

चौथा विचार भी मन के लड्ड ही है। जिस वैकल्पिक निवेश फंड की स्थापना की जानी है उसमें संस्थागत निवेशक योगदान करेंगे। ये संस्थागत निवेशक अगर सरकारी बीमा कंपनियां और बैंक नहीं हैं तो कौन हैं? अगर निजी क्षेत्र की कंपनियों ने जिनके पास क्षमताएं ज्यादा हैं, उन्हें इनमें कोई खास अवसर नहीं नजर आए हैं। यह सब हमें सन 1980 के दिनों की याद दिलाता है जब विकास वित्त संस्थान, यूनिट ट्रस्ट ऑफ इंडिया और सरकारी फंडिंग वाले म्युचुअल फंड और वेंचर कैपिटल फंड गठित किए गए थे।

अगर गहराई से देखा जाए तो यह स्पष्ट हो जाता है कि समिति की अनुशंसाएं मौजूदा निस्तारण प्रक्रियाओं को नुकसान पहुंचाती हैं और बाजार में निजी पहलों मसलन एआरसी आदि की मौजूदगी की अनदेखी करती हैं जबकि अगर उनको कड़े नियमों, गैरजवाबदेह बैंकरों और गैरभरोसेमंद कॉर्पोरेट से नहीं जूझना होता तो वे काफी फलफूल सकते थे। प्रोजेक्ट सशक्त के साथ ज्यादा से ज्यादा यही हो सकता है किएएमसी और एआईएफ के विचार दफन हो जाएं। अगर अनुशंसाओं को जरा सा भी क्रियान्वित किया गया तो हम फंसे हुए कर्ज के निस्तारण की प्रक्रिया में चीजों को एकदम उलट-पुलट कर देंगे। यकीनन समिति में बैठे बैंकर जिन्होंने इन भ्रामक और अव्यावहारिक अनुशंसाओं को तैयार किया है वे जानते होंगे कि वे क्या कर रहे हैं। मुझे आश्चर्य होता है कि यहां असल उद्देश्य क्या हो सकता है। क्योंकि इससे तो बैंकरों और फंसे हुए कर्ज के प्रवर्तकों को ही फायदा पहुंचता है। इस बीच तमाम सरकारी पहलों के बावजूद हमें अभी भी एक ऐसा विचार नहीं मिला है जो सरकारी बैंकों के बैंकरों और कंपनियों के प्रवर्तकों के गठजोड़ को तोड़ सके। गौरतलब है कि फंसे हुए कर्ज में 90 फीसदी से अधिक के लिए वही जवाबदेह हैं।

 

Print Friendly, PDF & Email