समस्या ही समस्या

स्रोत: द्वारा डॉ. ललित कुमार: राष्ट्रीय सहारा

भारत सरकार इस प्रयास में जुटी है कि स्कूलों में पढ़ा रहे लाखों अप्रशिक्षित शिक्षकों को मार्च 2019 तक प्रशिक्षित कर दिया जाए। प्रशिक्षण की प्रकृति ऑनलाइन रखी गई है। शिक्षा के अधिकार कानून को लागू करने के नाम पर गुणवत्ता के विभिन्न पहलुओं से काफी समझौता किया गया है और ऑनलाइन या दूर-शिक्षा के माध्यम से प्रशिक्षण इसी समझौते की कड़ी है। प्रशिक्षण देने के लिए अध्यापक शिक्षा अनियोजित एवं अनियंत्रित होती गई, एमएड जैसे पाठ्यक्रम में नामांकन के लिए आवंटित संख्या को दोगुणा से भी अधिक कर दिया गया, अप्रशिक्षित शिक्षकों की नियुक्ति की गई और सेवा पूर्व, सेवा-कालीन एवं दूर-शिक्षा के मायम से दिए गए शिक्षण-प्रशिक्षण कार्य-क्रम में ‘‘कसौटी संदर्भित मूल्यांकन’ का यथोचित प्रयोग नहीं किया गया।

प्रश्न पूछने न आए, श्यामपट्ट पर लिखने नहीं आए, वर्ग संचालन एवं वर्ग नियंतण्रकरना न आए, मूल्यांकन की प्रविधि को प्रयोग में न ला सके और शिक्षण के लिए आवश्यक तत्वों, सिद्धांतों एवं कौशल को आत्मसात नहीं कर सके तो फिर प्रशिक्षण की उपादेयता क्या है?शिक्षा का अधिकार कानून अपने जन्म से ही समस्याग्रस्त है, यद्यपि इसने गर्भ में लंबा समय बिताया है। अनिवार्य शिक्षा या सबके लिए शिक्षा जैसे सम्प्रत्यय प्राचीन एवं मध्यकालीन भारत में प्रचलित नहीं थे, यह आधुनिक शिक्षा की देन है।

छोटे-मोटे परिवर्तन को यदि हम नजरअंदाज करें तो 1813 का चार्टर एक्ट इस संदर्भ की एक प्रभावी कड़ी थी, क्योंकि इसी एक्ट के माध्यम से तो भारत में शिक्षा के लिए ईस्ट इंडिया कंपनी ने भारत के गवर्नर जनरल को एक लाख की राशि प्रति वर्ष खर्च करने की इजाजत दी। और हम कह सकते हैं कि शिक्षा के अधिकार से संबंधित यह प्रथम नियामक था। शिक्षा के अधिकार की विकास यात्रा में कई महत्त्वपूर्ण पड़ाव आए और 1870 का वर्ष एक नया संदेश लेकर तब आया जब इंग्लैंड में अनिवार्य शिक्षा कानून लागू हुआ और प्रभावित होकर सभी अंग्रेजी उपनिवेशों ने प्रभावी ढंग से इसकी मांग शुरू की।

दादा भाई नौरोजी एवं ज्योति राव फूले के प्रयास, हंटर कमीशन की प्रारंभिक शिक्षा को स्थानीय निकायों के हवाले करने की संस्तुति, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना, 1893 ई. में बड़ौदा के राजकुमार सर साहजी राव गायकवाड़ का बड़ौदा में नि:शुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा को लागू करना, 1906 में कांग्रेस द्वारा प्राथमिक शिक्षा को नि:शुल्क एवं अनिवार्य बनाने की मांग और गोखले द्वारा 1910 एवं 1911 में इम्पीरियल विधान परिषद में नि:शुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा के प्रतिवेदन को बढ़ाना-भारत में नि:शुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा कानून के लागू होने की यात्रा के महत्त्वपूर्ण आयाम हैं।

यह एक सुखद संयोग ही है कि गोखले के प्रयास के ठीक सौ साल बाद भारत सरकार ने इसे 01 अप्रैल, 2010 से लागू कर दिया है। यद्यपि दार्शनिक पहले भी शिक्षा को, खासकर विद्यालयी शिक्षा को, मौलिक अधिकार या जन्मजात अधिकार जैसा मानते थे, किन्तु 1992 (मोहिनी जैन एवं भारतीय संघ) एवं पुन: 1993 (उन्नीकृष्णन एवं आंध्र प्रदेश सरकार) में आया भारत के सर्वोच्च न्यायालय का ऐतिहासिक फैसला शिक्षा के मौलिक अधिकार को कानूनी रूप से मान्य कर गया।

शिक्षा को मौलिक अधिकार बनाने वाले 86वें संविधान संशोधन को अनुच्छेद 21-ए (भाग-3) के माध्यम से संशोधन विधेयक के रूप में संसद में वर्ष 2002 में पारित किया गया। विधेयक ने 6 से 14 साल के सभी बच्चों को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा के अधिकार को मौलिक अधिकार माना। इस संशोधन विधेयक के करीब 8 वर्ष बाद सरकार ने इसे लागू किया। शिक्षकों की मात्रात्मक आवश्यकता को आधार बनाकर गुणात्मकता से समझौता करने और फिर प्रशिक्षण के नाम पर खानापूरी कर गुणवत्ता हासिल कर लेने की बाजीगरी, समस्या का समाधन नहीं है।

प्रशिक्षण के फलस्वरूप प्रशिक्षण प्राप्त अध्यापकों के व्यवहार में अपेक्षित परिवर्तन का होना जरूरी है और इस क्रम में निर्धारित मानकों के आलोक में उनका ‘‘कसौटी संदर्भित मूल्यांकन’ आवश्यक है। अध्यापक शिक्षा की प्रकृति में आवश्यक बदलाव, वह भी बिना तयपरक मूल्यांकन के, देश हित में नहीं है, क्योंकि मानव संपदा से बड़ी कोई संपदा नहीं और सबसे अधिक युवा मानव संपदा वाला देश ऐसी गलती करने का जोखिम नहीं उठा सकता। सतत विकास लक्ष्य को 2030 तक हासिल कर सकने के उद्देश्य में यदि हमें सफल होना है तो शिक्षा के अधिकार कानून को प्रतिबद्धता एवं प्रमाणिकता से तो लागू करना ही होगा, साथ ही शिक्षक शिक्षा की उर्वर जमीन तैयार करनी होगी।

राजनेताओं एवं नौकरशाहों के अनावश्यक व्यय और सरकार एवं समाज में व्याप्त भ्रष्टाचार को नियंत्रित कर शिक्षा पर खर्च करने के लिए अधिक राशि बचाई जा सकती है। 18 अगस्त 2015 को आया इलाहाबाद हाईकोर्ट का एक निर्णय निर्देशित करता है कि सरकारी खजाने से वेतन पाने वाले सभी अधिकारी एवं कर्मचारी अपने बच्चों को अनिवार्य रूप से सरकारी विद्यालय में शिक्षा दें। राष्ट्रीय स्तर पर 06 से 18 आयु वर्ग के 12 प्रतिशत बच्चे तमाम कोशिशों के बाद भी विद्यालय से बाहर है।बिहार के लिए यह प्रतिशत 17 है तो उत्तर प्रदेश के लिए 20।

शिक्षा के अधिकार कानून को लागू करने के लिए इसे एक अभियान का रूप देना जरूरी है ताकि हम सरकार एवं सरकारी तंत्र के साथ समुदाय की उचित भागीदारी भी सुनिश्चित कर सकें। जन शिक्षा के माध्यम से समाज के सभी वर्ग को शिक्षा के अधिकार कानून के महत्त्वपूर्ण प्रावधानों की जानकारी देना, पिछड़ गए बच्चों को सामान्य स्तर तक लाने के लिए अतिरिक्त सहायता मुहैया कराना, सभी संबंधित क्रियान्वयन प्रतिनिधियों के बीच समन्वय स्थापित करना, पिछड़े राज्यों को अतिरिक्त सहायता देना, सतत विकास लक्ष्य के आलोक में भौतिक एवं अन्य संसाधनों की व्यवस्था करना, शिक्षा के अधिकार कानून को 0 से 18 वर्ष तक विस्तारित करना, लिंग-भेद को दूर करना, विशेष आवश्यकता वाले बच्चों को इस कानून के दायरे में लाना, शिक्षक की अनुपस्थिति को कड़ाई से नियंत्रित कराना, भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने, अध्यापन में उचित शिक्षण विधि एवं मूल्यांकन प्रविधि का उपयोग करना, बच्चों को आवश्यक सुविधाएं मुहैया कराने और योग्य एवं कर्मठ प्रशिक्षिक शिक्षकों की नियुक्ति करना, आदि जैसे कदम उठाए बिना शिक्षा का अधिकार कानून इसके मूल स्वरूप में लागू नहीं हो सकता और फिर हम सशक्त मानव विकास एवं निर्माण से तो वंचित होंगे ही, राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय लक्ष्यों को भी प्राप्त नहीं कर पाएंगे।

 

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