पुनर्विचार के लिए अपील जरूरी

स्रोत: द्वारा अवधेश कुमार: राष्ट्रीय सहारा

हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय ने ऐसे कई फैसले दिए हैं, जिन पर सघन बहस चल रही है। विवाहेतर यौन संबंधों यानी व्यभिचार को अपराध की श्रेणी से बाहर करने का मामला ऐसा ही है। सर्वोच्च न्यायालय ने व्यभिचार को अपराध मानने वाले भारतीय दंड संहिता की धारा 497 को असंवैधानिक करार देते हुए निरस्त कर दिया और कहा कि यह महिलाओं की स्वायत्तता और व्यक्तित्व को ठेस पहुंचाता है। मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने यहां तक कह दिया कि इस प्रावधान ने महिलाओं को पतियों की संपत्ति बना दिया था। किंतु महिलाओं के साथ समानता के अधिकार का समर्थन करने और व्यवहार में उसे जीने वालों ने भी इस फैसले पर चिंता प्रकट की है।

चूंकि मामला सर्वोच्च न्यायालय का है इसलिए कोई बड़ा व्यक्तित्व सीधे विरोध में नहीं उतरा है, लेकिन वातावरण वैसा ही है, जैसे समलैंगिकता को अपराध के दायरे से बाहर रखने के फैसले के समय था। प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा ने कहा कि 497 महिला के सम्मान के खिलाफ है। महिला को समाज की इच्छा के हिसाब से सोचने को नहीं कहा जा सकता। संविधान की खूबसूरती यही है कि उसमें ‘‘मैं, मेरा और तुम’ सभी शामिल हैं। पति कभी भी पत्नी का मालिक नहीं हो सकता है। न्यायमूर्ति एएम खानिवलकर ने कहा कि ये पूरी तरह से निजता का मामला है।व्यभिचार अनहैप्पी मैरिज यानी अप्रसन्न विवाह का केस भी नहीं हो सकता, क्योंकि अगर इसे अपराध मानकर केस करेंगे, तो इसका मतलब दुखी लोगों को सजा देना होगा।

न्यायमूर्ति डीवाई चंद्रचूड़ ने कहा कि यह कानून मनमाना है, महिला की सेक्सुअल च्वॉइस को यानी उसे यौन विकल्प अपनाने से रोकता है। न्यायमूर्ति रोहिंटन नरीमन ने कहा कि यह संविधान के मूल अधिकारों का उल्लंघन है। पीठ की महिला न्यायाधीश इंदु मल्होत्रा ने कहा कि कोई ऐसा कानून जो पत्नी को कमतर आंके, ऐसा भेदभाव संविधान की मूल भावना के खिलाफ है। एक महिला को समाज की मर्जी के मुताबिक सोचने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। इन न्यायाधीशों ने यूं ही यह निष्कर्ष भी नहीं दिया है। इसमें अलग-अलग देशों के कानूनों, प्राचीन से लेकर आधुनिक धर्मग्रंथों, संहिताओं आदि को उद्धृत किया गया है।

अंग्रेजों के समय भी लॉड मैकाले ने भारतीय दंड संहिता के पहले दस्तावेज में व्यभिचार को एक दंडनीय अपराध बनाने से इनकार कर दिया था। जिस पृष्ठभूमि में इस कानून को लागू किया गया उसे भी साफ किया है। 1860 में जब भारतीय दंड संहिता लागू हुई तो एक बड़ी आबादी खासकर हिन्दुओं में तलाक को लेकर कोई कानून नहीं था क्योंकि शादी को एक संस्कार माना जाता था। 1955 तक हिन्दू पुरुष को कई महिलाओं से शादी करने की आजादी थी। उस समय व्यभिचार तलाक का आधार नहीं हो सकता था, क्योंकि तलाक के कानून ही नहीं थे। हालांकि सच यही है कि हिन्दू समाज में पुरुषों का बहुविवाह कभी भी आम प्रचलन नहीं रहा। वैसे इस पुराने कानून के दो मुख्य आधार खत्म हो चुके हैं।

1955-56 के बाद हिन्दू कोड लागू हो गया, जिसके तहत हिन्दू पुरुष केवल एक ही औरत से शादी कर सकता है। हिन्दुओं के लिए भी तलाक का कानून बन गया और व्यभिचार को हिन्दू कानूनों में तलाक का आधार भी बना दिया गया। अब यहां इस कानून को समझना जरूरी है। धारा-497 के तहत अगर कोई शादीशुदा पुरुष किसी अन्य शादीशुदा महिला के साथ आपसी रजामंदी से शारीरिक संबंध बनाता है तो केवल उक्त महिला का पति एडल्टरी (व्यभिचार) के नाम पर उस पुरुष के खिलाफ केस दर्ज करा सकता था। वह व्यक्ति अपनी पत्नी के खिलाफ कार्रवाई नहीं कर सकता था और न ही विवाहेतर संबंध में लिप्त पुरुष की पत्नी इस दूसरी महिला के खिलाफ कोई कार्रवाई कर सकती थी। धारा 497 केवल उस पुरुष को अपराधी मानती थी, जिसके किसी और की पत्नी के साथ संबंध हों। निष्कर्ष यह निकाला गया कि महिला के पति को ही शिकायत का हक होना कहीं-न-कहीं महिला को पति की संपत्ति जैसा दर्शाता है। किंतु इसमें अगर पत्नी को मामला दर्ज करने का अधिकार नहीं था तो उसे विवाहेतर यौन संबंधों पर आपराधिक मामला का सामना करने से ही वंचित रखा गया।

इस नाते इसे केवल महिलाओं के खिलाफ मानना शत-प्रतिशत सही नहीं लगता। दूसरे, अगर अपराध नहीं माना जाएगा तो पति अपनी महिला दोस्त के साथ पत्नी की जानकारी में भी संबंध बनाए तो वह उस महिला के पति के माध्यम से भी मामला दर्ज नहीं करा सकती। और तलाक? तो जो पुरुष ऐसा करेगा वह तो शायद पत्नी से पिंड छुड़ाने की तैयारी कर चुका होगा। तो समस्या महिला के साथ भी खड़ी होगी। ध्यान रखिए, इस मामले के याचिकाकर्ता केरल के अनिवासी भारतीय जोसेफ साइन ने धारा-497 को चुनौती देते हुए कहा था कि कानून लैंगिक दृष्टि से तटस्थ होता है लेकिन इसके प्रावधान पुरुषों के साथ भेदभाव करता है।

इसे लैंगिक तटस्थ (जेंडर न्यूट्रल) करने का संविधान पीठ से अनुरोध किया गया था। यानी विवाहेतर संबंध वाले महिला और पुरुष दोनों को अपराध की परिधि में लाया जा सके। कानून को रद्द करने का संदेश यह जा रहा है कि अब विवाहेतर यौन संबधों को पूरी आजादी मिल गई है। भारत में विवाह आज भी एक संस्कार है। इसमें यौन नैतिकता सवरेपरि है। यदि यह स्तंभ टूट गया तो केवल यौन स्वैच्छाचार को ही प्रोत्साहन नहीं मिलेगा, परिवार का विघटन होने लगेगा। हालांकि फैसले में ही कुछ बातें कही गई हैं। जैसे यह तलाक का आधार तो बन सकता है लेकिन अपराध नहीं।

अगर इस वजह से पार्टनर खुदकुशी कर ले खुदकुशी के लिए उकसाने का मामला माना जा सकता है। कोई व्यवहार शादी टूटने का आधार बन सकता है, आत्महत्या का कारण बन सकता है लेकिन उस कृत्य को अपराध नहीं माना जाएगा। इस व्यवस्था पर पुनर्विचार जरूरी है। इसलिए जरूरी है कि विवाहेतर संबंधों को अपराध के दायरे से बाहर रखने के वर्तमान और समलैंगिकता को भी मान्य कर देने के फैसले के विरुद्ध अलग-अलग पुनर्विचार याचिकाएं डाली जाएं। फैसले में दीपक मिश्रा ने कहा कि हम मानते हैं कि यहां आपसी रिश्ते कानून से नहीं भावनाओं और सदियों से चली आ रही सामाजिक दायित्व बोध से कायम रहते हैं। किंतु कानून से इन सबको मुक्त करने का भी मनोवैज्ञानिक प्रभाव होगा और वह नकारात्मक ही होगा।

 

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