भूख का दुष्चक्र

स्रोत: द्वारा बिज़नेस स्टैण्डर्ड

ग्लोबल हंगर इंडेक्स (जीएचआई) के 13वें और नवीनतम संस्करण में भारत एक बार फिर दुनिया की सबसे कमजोर रैंकिंग वाले देशों के बीच है। जीएचआई ने 119 देशों की रैंकिंग में भारत 103 स्थान पर है। वह पाकिस्तान (106) और उत्तर कोरिया (109) से थोड़ी बेहतर स्थिति में है लेकिन वह अन्य पड़ोसी मुल्कों नेपाल (72) और श्रीलंका (67) से काफी पीछे है। भारत इंडोनेशिया (73) और दक्षिण आफ्रीका (60) और ब्राजील (31) जैसे देशों से भी काफी पीछे है जो अन्य मानकों पर उसके समतुल्य हैं।

चीन 25वें स्थान के साथ काफी आगे है। इस सूचकांक में भूख का आकलन कैलोरी के आधार पर नहीं बल्कि चार विशिष्ट मानकों के आधार पर किया जाता है। ये मानक हैं अल्पपोषण, बच्चों की उम्र के अनुसार औसतन कम ऊंचाई, उम्र की तुलना में उनका कम वजन और बाल मृत्युदर। ऐसा नहीं है कि भारत ने इस क्षेत्र में सुधार नहीं किया है। सन 1999-2000 में पहली बार किए गए अध्ययन से अब तक भारत में अल्पपोषित आबादी का प्रतिशत 18.2 फीसदी से कम होकर 14.8 फीसदी हो गया है। पांच वर्ष से कम उम्र के बच्चों की ऊंचाई कम होने के मामले 54.2 फीसदी से घटकर 38.4 फीसदी रह गए हैं और पांच वर्ष से कम उम्र के बच्चों में बाल मृत्यु दर के मामले 9.2 फीसदी से घटकर 4.3 फीसदी हो गए हैं।

बावजूद भारत इस सूचकांक के 'गंभीर' श्रेणी के देशों में शुमार है। इसकी पर्याप्त वजह भी हैं। मिसाल के तौर पर उपरोक्त आंकड़े दुनिया में सबसे तेज गति से बढ़ रही अर्थव्यवस्था के लिए वाकई शर्मिंदगी का सबब हैं। अभी भी ढेर सारे बच्चे अल्पपोषण से जुड़ी समस्याओं से जूझ रहे हैं। परंतु शायद देश के बच्चों में सबसे बड़ी समस्या है औसत से कम वजन की। अन्य मानकों के उलट दी गई अवधि में इस क्षेत्र में देश का प्रदर्शन 17.1 फीसदी से बिगड़कर 21 फीसदी हो गया है। यह गंभीर कुपोषण का परिचायक है और बीते 5 से 10 वर्ष में इसमें बहुत तेजी से इजाफा हुआ है।

आंकड़ों के मुताबिक यह देश की विकास गाथा पर एक धब्बा है। आंकड़े बताते हैं कि अन्य मानकों पर भी जो सुधार हुआ है, वह वर्ष 2005 के बाद हुआ है जब केंद्र और राज्य स्तरों पर इस दिशा में कई नीतिगत पहल की गईं। उदाहरण के लिए महाराष्ट्र में इसी अवधि में हंगर मिशन की शुरुआत की गई। यह भूख की समस्या से निपटने की सीधी कोशिश थी। इसके अलावा मध्याह्न भोजन और माताओं के पोषण की स्थिति में भी काफी सुधार किया गया।

लब्बोलुआब यह कि समस्या का हल छोटे बच्चों और स्तनपान करा रही मांओं तक पोषण संपन्न भोजन के व्यापक वितरण और बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं की पहुंच सुनिश्चित करने में है। इस संदर्भ में देखा जाए तो इस सूचकांक को लेकर कृषि मंत्री राधा मोहन सिंह की प्रतिक्रिया गलत नजर आती है। उन्होंने कहा कि सरकार सन 2030 तक भूख के मामलों को पूरी तरह समाप्त करने की दिशा में काम कर रही है।

उन्होंने इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए खेती की उपज बढ़ाने को एक जरिया बताया। परंतु विभिन्न शोधकर्ता यह बता चुके हैं कि केवल खाद्यान्न उत्पादन की मदद से बच्चों में अल्पपोषण की समस्या से नहीं निपटा जा सकता है। बल्कि वितरण और खाने की समय पर उपलब्धता अधिक मायने रखती है। हकीकत में देश में खाद्यान्न अधिशेष की स्थिति है। ऐसे में भूख की समस्या समाप्त करने के लिए 2030 का लक्ष्य क्यों तय करना? भारत संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता की आकांक्षा रखने वाला देश है। कम से कम उसे अपने बच्चों के लिए उचित पोषण और खाने की समय पर उपलब्धता सुनिश्चित करनी चाहिए।

 

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