इंटरनेट पर नेट निरपेक्षता और निजता की बहस

स्रोत: द्वारा अजित बालकृष्णन: बिज़नेस स्टैण्डर्ड

एक औसत नागरिक इंटरनेट को ऐसे उपाय के रूप में देखता है जिसने ईमेल और मेसेंजर की मदद से उसके लिए अपने मित्रों और प्रिय जनों से संवाद और संपर्क को आसान और सस्ता बना दिया है। ऐसे लोग जब अपना प्रिय अखबार या वेबसाइट खोलते होंगे और वहां उन्हें नेट निरपेक्षता, निजता के पक्ष या विपक्ष में आलेख नजर आते होंगे तो उनके मन में यह सवाल जरूर आता होगा कि आखिर यह सब है क्या? आप किसी वेबसाइट पर जाते हैं और वहां आपका सामना एक ऐसे संदेश से होता है कि 'यह वेबसाइट वेब एनालिटिक्स और मार्केटिंग के लिए कुकीज का इस्तेमाल करती है। अगर आप बिना कुकीज को निष्क्रिय किए इस वेबसाइट पर बने रहते हैं तो आप अपनी हार्ड ड्राइव में कुकीज जमा करने की इजाजत देते हैं।'

अब आपको अपने ईमेल पर शॉपिंग साइट के विज्ञापन मिलने लगते हैं और एक नया पॉप अप बताता है, 'यह संदेश वायरस रहित है परंतु ईमेल की पूरी सुरक्षा तय करना संभव नहीं है। हमारे तमाम प्रयासों के बावजूद ईमेल का डेटा संक्रमित हो सकता है, उसमें सेंध लगाई जा सकती है या उसे खराब किया जा सकता है। इसलिए ईमेल पाने वाले को समुचित सॉफ्टवेयर की मदद से इसकी सुरक्षा सुनिश्चित करनी चाहिए क्योंकि भेजने वाला इस ईमेल की सुरक्षा की कोई गारंटी नहीं लेता।' आप सोचते हैं कि यह सब अचानक इतना खतरनाक कैसे हो गया? क्या आपने कुछ गलत किया है? जैसा कि तमाम गंभीर संपादकीय में कहा जाता है कि क्या राजनीतिक दल आप द्वारा इंटरनेट पर भरे किसी फॉर्म का इस्तेमाल आपका रुझान अपनी पार्टी की ओर करने में कर सकता है?

आप इन बातों को समझ सकें इसके लिए मैं इंटरनेट उद्योग का पूरा परिदृश्य और इस पर नियंत्रण के लिए संघर्ष कर रहे कारोबारियों के बारे में चंद बातें बताना चाहता हूं। सबसे पहले बात दूरसंचार कंपनियों की जो आपके पर्सनल कंप्यूटर या स्मार्ट फोन से डेटा को दूसरी जगह पहुंचाने के लिए पाइप मुहैया कराती हैं। ऐसी कंपनियां भी हैं जो समय और पैसा खर्च करके आपको वेब सर्च या चैट की सुविधा देती हैं। कंटेंट कंपनियां आपको खबरें या फिल्म समीक्षा मुहैया कराती हैं। इसके अलावा ई-कॉमर्स कंपनियां भी हैं।

इंटरनेट के आरंभिक दशक में ये सारे कारोबार सहअस्तित्व में रहे। उसके बाद गेमों का दौर आया। कुछ वेब सेवा कंपनियां जिनके पास काफी पैसा था, वे अपने क्षेत्र की दूरसंचार कंपनियों के पास गईं और उनसे कहा कि अगर अन्य कंपनियों की जगह उनकी चैट सेवा को स्थान दिया जाए तो वे अतिरिक्त राशि दे सकती हैं। दूरसंचार कंपनियों ने मुनाफे के लालच में पेशकश स्वीकार कर ली। परंतु अन्य वेब कंपनियों ने इसका विरोध शुरू कर दिया। उनके मुताबिक यह कुछ था जैसे कि वृहन्मुंबई महानगरपालिका किसी कार निर्माता कंपनी से पैसे ले और मुंबई की सड़कों पर केवल उसी कंपनी की कार चलने दे। उनका कहना था इंटरनेट को निरपेक्ष और निष्पक्ष होना चाहिए। नेट निरपेक्षता की यही लड़ाई है।

वेब सेवा कंपनियों की अपनी दिक्कतें हैं। इस वर्ष के आरंभ तक वे विज्ञापनदाताओं को समाचार पत्रों और पत्रिकाओं की तुलना में लुभाने के लिए कह सकते थे कि उनके पास अपने उपयोगकर्ताओं के नाम, उम्र, उनके काम करने की जगह और उनकी रुचियों से जुड़े आंकड़े हैं जिनकी मदद से विज्ञापनों को अधिक लक्षित किया जा सकता है। ये दलीलें कारगर साबित हुईं और विज्ञापन के पैसे का एक बड़ा हिस्सा प्रिंट और टेलीविजन से वेब सेवा कंपनियों की ओर स्थानांतरित होने लगा। इसके साथ ही निजता को लेकर हो हल्ला शुरू हुआ। यह सवाल उठने लगा कि क्या किसी उपयोगकर्ता के डेटा का इस्तेमाल उसकी जरूरत की वस्तुओं की खरीद के लिए उसे लक्षित करने में किया जा सकता है।

दूरसंचार कंपनियों और वेब सेवाओं के बीच समझौते की शर्तें विभिन्न देशों में अलग-अलग हो सकती हैं। जिन देशों में दूरसंचार कंपनियां और वेब सेवा कंपनियां दोनों निजी क्षेत्र की हैं (उदाहरण के लिए अमेरिका) वहां लड़ाई सरकारी नियामक की है और नेट निरपेक्षता और निजता को लेकर विभिन्न सार्वजनिक धड़ों के बीच चर्चा है।  ओबामा प्रशासन के दौरान नेट निरपेक्षता से जुड़ी ताकतों ने कहा कि अमीर और गरीब, स्टार्टअप और प्रतिष्ठिïत कंपनियां, सभी को इंटरनेट का इस्तेमाल एक समान ढंग से करने का अवसर मिलना चाहिए। परंतु ट्रंप प्रशासन और उसके मुक्त बाजार के विचारों के बीच नेट निरपेक्षता की अवधारणा ठहरती नहीं दिखती। ट्रंप प्रशासन के नीति निर्माताओं का मानना है कि दूरसंचार कंपनियों को कैरिएज शुल्क वसूलने का अधिकार होना चाहिए क्योंकि केवल तभी वे अमेरिका को अंतरराष्ट्रीय रूप से प्रतिस्पर्धी बनाए रखने और रोजगार सृजन करने के लायक रह जाएंगी। जिन देशों में दूरसंचार कंपनी सरकारी और वेब सेवा कंपनियां निजी हैं (जैसे कि चीन) वहां नेट निरपेक्षता और निजता को लेकर कोई बहस ही नहीं है।

यूरोप का मामला अलग है। टिम बर्नस ली ने वेब का अविष्कार किया लेकिन यूरोप में निजी या सरकारी क्षेत्र की एक भी विश्वस्तरीय वेब सेवा कंपनी  नहीं है। क्या नेट निरपेक्षता और निजता पर यूरोप की सख्ती की यह भी एक वजह हो सकती है? इस सख्त स्थिति की बदौलत यूरोपीय कंपनियों के पास एक अवसर है कि वे वेब सेवाओं में अपनी मौजूदगी दिखा सकें। परंतु स्थानीय वेंचर कैपिटल व्यवस्था की कमी उनके आड़े आ रही है। इसके अलावा यूरोपीय देशों में भाषाई विविधता भी उनके लिए एक साथ बड़े पैमाने पर काम करना मुश्किल बना रही है।

पिछले दिनों खबर आई कि रिपब्लिकन पार्टी के नीतिकारों ने फेसबुक डेटा का इस्तेमाल अमेरिकी राष्ट्रपति चुनावों को प्रभावित करने में किया। ऐसी खबरें इन वैचारिक संघर्षों को और उकसावा दे रही हैं। यह भी एक वजह है जिसके चलते निजता के कानून को मजबूती से लागू किया जाना चाहिए। भारत में भी यूरोप जैसी स्थिति है। परंतु उम्मीद की जानी चाहिए कि भारतीय नीतिकार जो इन दिनों नेट निरपेक्षता और निजता पर पेशकदमी के पहले विचार-विमर्श कर रहे हैं वे अपने समक्ष मौजूद विकल्पों पर उचित दृष्टि डालेंगे। यह चयन आर्थिक और वैचारिक विकल्पों के बीच होगा और साथ ही भारतीय और अंतरराष्ट्रीय दूरसंचार और वेब सेवा कंपनियों की संभावित भूमिका के बारे में।

 

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