चुनौतियां और अवसर

स्रोत: द्वारा जयंतीलाल भंडारी: राष्ट्रीय सहारा

इस समय देश से निर्यात बढ़ाने और व्यापार घाटा कम करने की डगर पर कई अभूतपूर्व चुनौतियां हमें दिखाई दे रही हैं। इन चुनौतियों में सबसे बड़ी चुनौती यह है कि हाल ही मेंयूरोपीय यूनियन, चीन, जापान, कनाडा, रूस, श्रीलंका, ताइवान, दक्षिण करिया और थाईलैंड ने अमेरिका के साथ मिलकर विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) में भारत की निर्यात संवर्धन योजनाओं के खिलाफ प्रस्ताव प्रस्तुत किया है।

पहले भी मार्च, 2018 में अमेरिका ने डब्ल्यूटीओ में भारत के द्वारा दी जा रही निर्यात सब्सिडी को रोकने हेतु आवेदन दिया था। भारत की निर्यात संवर्धन योजनाओं के विरोध में डब्ल्यूटीओ में जो आवाज उठाई गई है, उसमें कहा गया है कि अब भारत अपने निर्यातकों के लिए सब्सिडी की योजनाएं लागू नहीं कर सकता क्योंकि ऐसा करना डब्ल्यूटीओ के समझौते का उल्लंघन है। कहा गया है कि निर्यात के लिए सब्सिडी ऐसे देश ही दे सकते हैं, जहां प्रति व्यक्ति आय एक हजार डॉलर सालाना से कम है।

भारत में प्रति व्यक्ति आय इसके दोगुने के बराबर है। भारत का कहना है कि उसके पास निर्यात संवर्धन योजनाओं को चरणबद्ध तरीके से समाप्त करने के लिए आठ वर्षो का समय है।अमेरिका और अन्य देशों का कहना है कि जिन देशों की प्रति व्यक्ति आय तीन वर्षो से लगातार एक हजार डॉलर से अधिक है, उन देशों पर यह नियम लागू नहीं होता है। ऐसे में इस विवाद के समाधान के लिए अब न्यायसंगत समाधान हेतु डब्ल्यूटीओ ने फिलीपींस के जो एंटानियो बुएनकैमिन की अध्यक्षता में एक पेनल बनाया है, जो आगामी तीन महीनों में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत करेगा।

ऐसे में विशेषज्ञों का कहना है कि इस मामले में भारत कमजोर पड़ सकता है, और वर्ष 2018 के अंत तक भारत को विवादित योजनाओं पर निर्यात पर सब्सिडी खत्म करने के मद्देनजर बड़ा निर्णय लेना पड़ सकता है। एक ओर जब निर्यात परिदृश्य पर चुनौतियां ही चुनौतियां हैं, तब देश से निर्यात बढ़ाना मुश्किल भरा काम है। हाल ही में 21 अगस्त को नीति आयोग ने कहा है कि इस समय देश की अर्थव्यवस्था के लिए रुपये में गिरावट से ज्यादा चिंता व्यापार घाटे की है। ऐसे में देश से निर्यात बढ़ाने की कवायद किए जाने की जरूरत है।

गौरतलब है कि केंद्र सरकार के द्वारा चालू वित्तीय वर्ष 2018-19 में देश का निर्यात 350 अरब डॉलर तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा गया है। लेकिन यह लक्ष्य प्राप्त करना कठिन है।नियंतण्र निर्यात मांग कम होने से वर्ष 2017-18 में देश से कुल 303 अरब डॉलर मूल्य की वस्तुओं का निर्यात किया गया जबकि वर्ष 2016-17 में निर्यात का मूल्य 274 अरब डॉलर रहा। निर्यात के ये आंकड़े संतोषजनक नहीं रहे हैं। अब देश के सामने नियंतण्र व्यापार युद्ध से प्रभावित होने की नई चुनौतियां भी सामने खड़ी हैं, इससे भी निर्यात प्रभावित होने की आशंका है। पिछले वित्त वर्ष में भारत का व्यापार घाटा करीब 150 अरब डॉलर था। इसमें से एक तिहाई घाटा चीन से द्विपक्षीय व्यापार के चलते हुआ था।

इस वर्ष भी चीन से व्यापार घाटे में कमी नहीं आई है। संसद की विदेश व्यापार से संबंधित नरेश गुजराल समिति ने अपनी 145वीं रिपोर्ट में चीन से माल के बढ़ते आयात से घरेलू उद्योग और रोजगार के अवसरों को हो रहे नुकसान पर गंभीर चिंताएं प्रस्तुत की हैं। वस्तुत: देश से निर्यात नहीं बढ़ने के कई कारण हैं, जिन पर विचार किया जाना जरूरी हो गया है। वाहन निर्माण, वस्त्र, इंजीनियरिंग वस्तु, परिष्कृत हीरे और चमड़े की वस्तुओं आदि उद्योगों को मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है। चूंकि देश के लिए करीब 115 अरब डॉलर की सालाना विदेशी मुद्रा कमाने वाले आईटी सेवा उद्योग की आधे से अधिक आमदनी अमेरिका को सॉफ्टवेयर के निर्यात से होती है, इसलिए इस क्षेत्र को दरपेश समस्याओं पर खास दिया जाना अपेक्षित है।

गौरतलब है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के वीजा संबंधी कठोर निर्णय से आउटसोर्सिग के क्षेत्र में परचम फहराते हुए आगे बढ़ने वाले भारत के समक्ष चिंताएं बढ़ गई हैं, और अमेरिका से आईटी निर्यात की आमदनी आधी से भी कम रह जाने की आशंका है। ऐसे में देश से निर्यात बढ़ाने और देश का व्यापार घाटा कम करने के लिए रणनीतिक कदम उठाए जाने होंगे। देश से कृषि निर्यात की नई संभावनाएं उभर कर दिखाई दे रही हैं। देश में खाद्यान्न, फलों और सब्जियों का उत्पादन हमारी खपत से बहुत ज्यादा है। साथ ही, देश में 6.8 करोड़ टन गेहूं और चावल का भंडार भी है। गौरतलब है कि यह जरूरी बफर स्टॉक के मानक से दोगुना है। दूध का उत्पादन आबादी बढ़ने की दर से चार गुना तेजी से बढ़ रहा है। देश में दूध उत्पादन वर्ष 2017-18 के दौरान बढ़कर 17.63 करोड़ टन रहने का अनुमान है। चीनी का उत्पादन 3.2 करोड़ टन होने की उम्मीद है, जबकि देश में चीनी की खपत 2.5 करोड़ टन है।

इसी तरह से देश में फलों और सब्जियों का उत्पादन मूल्य 3.17 लाख करोड़ रुपये हो गया है। इस तरह कृषि क्षेत्र में अतिरेकी उत्पादन देश के लिए निर्यात की नई संभावनाएं प्रस्तुत कर रहा है। इसके तीन प्रमुख कारण हैं। पहला कारण है कि पिछले दिनों सरकार के द्वारा घोषित की गई नई कृषि निर्यात नीति। इस नीति के तहत आजादी के बाद से अब तक पहली बार सरकार ने कृषि निर्यात बढ़ाने के लिए उदार प्रोत्साहन निर्धारित किए हैं, और लक्ष्य रखा है कि कृषि निर्यात मौजूदा 30 अरब डॉलर से बढ़ाकर 2022 तक 60 अरब डॉलर के स्तर पर पहुंचाया जाए। इसके साथ ही तेजी से निर्यात बढ़ाने के उद्देश्य से स्थापित सेज को गतिशील बनाया जाना भी जरूरी है।

हम आशा करें कि सरकार के द्वारा वर्ष 2020 तक निर्यात बाजार में तेजी से आगे बढ़ने और नियंतण्र निर्यात में भारत का हिस्सा दो फीसदी तक पहुंचाने के लिए निर्यात की नई संभावनाओं को साकार किया जाएगा तथा निर्यात के नए बाजारों में दस्तक दी जाएगी। इस समय जब देश के निर्यात पर डब्ल्यूटीओ की चुनौती सामने खड़ी हुई है, तो ऐसे में अब वक्त आ गया है कि व्यापारिक सुविधाओं और निर्यात के लिए बुनियादी ढांचा बढ़ाकर लालफीताशाही में कमी लाई जाए जिससे सरकार के सब्सिडी संबंधी समर्थन के बिना भी निर्यातकों की प्रतिस्पर्धा क्षमता बढ़ सके। साथ ही, इस समय डॉलर के मुकाबले कमजोर रुपये का लाभ लेकर भी निर्यात बढ़ाने का बेहतर अवसर मुट्ठी में लिया जाना चाहिए।

 

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