दागी नेताओं पर लगाम लगाए संसद

स्रोत: द्वारा ए सूर्यप्रकाश: दैनिक जागरण

राजनीति के अपधीकरण को लेकर सुप्रीम कोर्ट के हालिया निर्णय के अलग-अलग निहितार्थ हैं। इससे मतदान के समय मतदाता के समक्ष उम्मीदवार की और ज्यादा जानकारियां होंगी, लेकिन दागी उम्मीदवारों को चुनाव लड़ने से प्रतिबंधित करने की उम्मीद पूरी होनी अभी शेष है। ऐसा इसलिए, क्योंकि शीर्ष अदालत ने यह तो माना कि विधायी संस्थाओं में आपधिक तत्वों का आना वैसा ही है जैसे कोई दीमक लोकतंत्र को खोखला करता है, लेकिन उन्हें बाहर करने के मसले पर कहा कि वह इसके लिए कानून नहीं बना सकती।

कोर्ट के अनुसार, यह काम संसद के दायरे में आता है, मगर संसद ने अभी तक इस सड़ांध की सफाई को लेकर दृढ़ता नहीं दिखाई है। बीते कई वर्षो से शीर्ष अदालत ने काफी सक्रियता दिखाते हुए यह सुनिश्चित किया है कि चुनाव लड़ने वाले प्रत्याशी अपनी ज्यादा से ज्यादा जानकारियां सार्वजनिक करें। यह अदालती निर्देश का ही असर है कि चुनाव लड़ने वाले प्रत्याशियों को अपनी शैक्षिक योग्यता, संपत्ति एवं देनदारी और आपधिक रिकॉर्ड का ब्योरा हलफनामे में देना पड़ता है।

हालिया फैसले में अदालत ने एक कदम आगे बढ़ाते हुए निर्देश दिया कि प्रत्याशियों को स्थानीय मीडिया के जरिये जनता को अपने आपधिक रिकॉर्ड के बारे जानकारी देनी होगी। इसके साथ ही आपराधिक अतीत वाले लोगों को टिकट देने वाले राजनीतिक दलों को भी उनका रिकॉर्ड अपनी वेबसाइट पर देना चाहिए। नामांकन भरने के बाद प्रत्याशी और राजनीतिक दल को बहुप्रसारित अखबारों में उक्त प्रत्याशी के आपराधिक अतीत का पूरा ब्योरा देने के साथ ही स्थानीय इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में कम से कम तीन बार इसके बारे में बताना होगा।

यह इसलिए जरूरी किया गया है ताकि आम नागरिक उनके बारे में भलीभांति जागरूक हो सकें जिन्हें वे अपना जनप्रतिनिधि बनाना चाहते हैं। देश की विधायी संस्थाओं में आपराधिक अतीत वाले वाले लोगों के लगातार बढ़ते प्रवेश से चिंतित सुप्रीम कोर्ट इस पर अपनी कड़ी नाजगी तो जाहिर कर चुका है, लेकिन ऐसे लोगों के चुनाव लड़ने पर उसने कोई प्रतिबंध नहीं लगाया। उसने कहा कि वक्त आ गया है कि संसद कानून बनाकर यह सुनिश्चित करे कि गंभीर आपराधिक मामलों में फंसे लोग मुख्यधारा की राजनीति से न जुड़ सकें। इस मामले में अदालत ने विधि आयोग के सुझाव को भी याद दिलाया कि अदालत में दोषी सिद्ध हुए व्यक्ति के लिए चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध लगा देना चाहिए।

अदालत ने कहा कि यह राजनीति के अपराधीकरण को लेकर समाज की चिंता को दर्शाता है, लेकिन विधायिका ने इस पर कोई प्रभावी कानून ही नहीं बनाया है। अदालत चाहती है कि संसद इसके लिए इतना सशक्त कानून बनाए जिसमें सभी दलों के लिए यह अनिवार्य हो कि वे गंभीर अपराध के दोषियों को अपनी प्राथमिक सदस्यता से निलंबित करें और उन्हें चुनाव लड़ने के लिए टिकट न दें। अदालत का मानना है कि इससे राजनीति को अपराध से मुक्ति दिलाने में मदद मिलेगी।

इस फैसले ने झारखंड मुक्ति मोर्चा से जुड़े मामले में दिए सुप्रीम कोर्ट के एक और निर्णय की याद दिला दी है। यह मामला 1993 में पीवी नरसिम्हा व की सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव में मदद की एवज में सांसदों को रिश्वत देने से जुड़ा था।राव अल्पमत सरकार चला रहे थे और लोकसभा में संख्याबल के मोर्चे पर पिछड़ रहे थे। उन पर आरोप था कि अपनी सरकार बचाने के लिए उन्होंने लोकसभा में दस सांसदों को समर्थन के बदले घूस दी। इनमें से चार सांसद झारखंड मुक्ति मोर्चा के थे जिन्हें समर्थन के बदले कुल 2.8 करोड़ रुपये मिले।वोट के बदले नोट के दम पर 28 जुलाई, 1993 को राव सरकार ने विश्वासमत हासिल किया।

इसके पहले का घटनाक्रम बेहद सनसनीखेज रहा। रिश्वत देने के लिए नोटों से भरे ब्रीफकेस लेकर एक वरिष्ठ नेता कर्नाटक से दिल्ली पहुंचे। दिल्ली हवाई अड्डे पर ब्रीफकेस खुल गया और नोट बाहर आ गिरे, जिन्हें देखकर लोग हतप्रभ रह गए। सदन में मतदान के बाद का घटनाक्रम हास्यास्पद था। सांसद रिश्वत में मिले नोटों को बोरे में भरकर एक ष्ट्रीयकृत बैंक की शाखा में पहुंचे कि इन्हें उनके खाते में जमा कर दिया जाए। अपने वोट बेचने वाले इन सांसदों में से किसी के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हुई।

ये भ्रष्ट सांसद इसलिए बच गए, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अनुच्छेद 105 के तहत संविधान इन सांसदों पर मुकदमा चलाने की इजाजत नहीं देता।अनुच्छेद 105 (1) के अनुसार संसद में सांसदों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है। वहीं अनुच्छेद 105 (2) के अनुसार संसदीय कार्यवाही में अपने किसी बयान या मतदान को लेकर किसी सांसद को अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकती। इस प्रावधान ने सांसदों को ऐसा रक्षा कवच दे रखा है कि वे संसद में चाहे जो कहें या करें, उन पर कोई कानूनी कार्रवाई नहीं हो सकती।

इस मामले में जिन सांसदों ने रिश्वत ली उन पर भ्रष्टाचार निरोधक अधिनियम के तहत मामला चला, मगर सांसदों ने अनुच्छेद 105(2) के आधार पर दलील दी कि संसद में उनकी गतिविधि पर उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हो सकती। अदालत को इस दलील में दम लगा। सुप्रीम कोर्ट की पांच सदस्यीय पीठ ने बहुमत से फैसला दिया कि अनुच्छेद 105(2) के तहत इन सांसदों को रक्षा आवरण मिला हुआ है। दूसरे शब्दों में कहें तो अगर उन्होंने वोट के बदले रिश्वत ली तब भी उनके खिलाफ कुछ नहीं किया जा सकता, क्योंकि उन्होंने सदन में ऐसा किया। हालांकि अदालत ने कहा कि रिश्वत देने वालों और लेने वाले उन लोगों पर मुकदमा चलाया जाना चाहिए जिन्होंने सदन में वोट नहीं दिया, क्योंकि केवल वोट देने वालों को ही संवैधानिक संरक्षण हासिल है।

इसमें सुप्रीम कोर्ट के संवैधानिक रुख का औचित्य समझ आता है, लेकिन इसके तमाम दुष्प्रभाव देखने को मिले जिनमें सबसे बड़ा यही कि विधायी संस्थाओं में दाखिल होने वाले प्रतिनिधियों की गुणवत्ता में भारी कमी आई है। यह मानने में हैरानी नहीं होनी चाहिए कि जिन्हें कानून बनाने का दायित्व मिलता है वही उसे तोड़ने और र्दुव्‍यवहार करने का लाइसेंस समझ लेते हैं और स्वयं को अन्य लोक सेवकों की तुलना में श्रेष्ठ मानते हैं। हालांकि शीर्ष अदालत ने यह कहा है कि वह आपराधिक रिकॉर्ड वालों के चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध नहीं लगा सकती, लेकिन इस मामले में अभी तक शिथिल रवैया अपनाने वाली संसद से किसी निर्णायक कदम की उम्मीद करना बेमानी ही होगा। चूंकि पार्टियां टिकट देते समय उम्मीदवार की ‘जीतने की क्षमता’ को ही सबसे ज्यादा तवज्जो देती हैं और बीते कुछ वर्षो से आपराधिक अतीत वाले जनप्रतिनिधियों की संख्या लगातार बढ़ रही इसलिए क्या संसद सुप्रीम कोर्ट की चिंता और बेचैनी पर गौर करके अपधियों को राजनीति से दूर रखने के लिए कोई कानून बनाएगी? देश की सबसे बड़ी विधायी संस्था को इस मामले में खुद पर जताए जा रहे संदेहों को निश्चित रूप से दूर करना चाहिए।

 

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