स्थानीयकरण और संप्रभुता

स्रोत: द्वारा अनिल उपाध्याय: राष्ट्रीय सहारा

वर्तमान समय में डेटा कितना महत्त्वपूर्ण है, इसका अंदाजा इसी लगाया जा सकता है कि इसे ‘‘नया तेल’ कहा जाने लगा है। सूचना का भण्डार ही धन का स्रेत है। आज सूचना का ज्ञान ही परम ज्ञान है। ऐसे में डेटा ही संपत्ति है। डेटा से व्यक्ति की हर गतिविधि को पता लगाने के लिए अति संवेदनशील तकनीक को प्रयोग में लाया जा रहा है। कृत्रिम प्रज्ञता (आर्टफिीशियल इंटेलिजेस ) का उपयोग करके पता लगाया जा रहा है कि व्यक्ति की उपयोग संबंधी एवं रहन-सहन संबंधी प्राथमिकताएं क्या हैं और उन्हीं के आधार पर मार्केटिंग व्यय किया जा रहा है। ऐसा मार्केटिंग व्यय व्यर्थ नहीं जाता। व्यवसाय में वृद्धि होती है।

इस प्रकार डेटा से उत्पन्न सूचना प्राप्त व्यवसाय लाभप्रद स्थिति में हो जाते हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में माइक्रो फाइनेंस में कार्यरत कंपनियों में भारी विदेशी निवेश है। इस क्षेत्र में भी यह सूचना का प्रतिफल हो सकता है। जो पेमेंट रुझान से विकसित होती ग्रामीण अर्थव्यवस्था के संकेत विदेश में स्थित कंपनियों को अधिक विश्वस्त रूप से प्राप्त हो जाते हों और उसी का उपयोग ‘‘बॉटम ऑफ पिरामिड’ नीतियों में होता हो। ऐसे ही इस सूचना का उपयोग भी किया जा सकता है कि आयातित सामान गोल्ड और पेट्रोल पर कितना पैसा खर्च किया जा रहा है।इन रुझानों को आर्टफिीशियल इंटेलिजेस के उपयोग से विदेशी मुद्रा के व्यवहार को भी भांपा जा सकता है, और उसी के प्रयोग से बहुत बड़ी मात्रा में लाभ अर्जित किया जा सकता है।

इन महत्त्वपूर्ण बातों का संज्ञान लेते हुए आरबीआई ने ‘‘डेटा संप्रभुता’ के मद्देनजर वित्तीय सेवा देने वाली समस्त कंपनियों को भारत से संबंधित समस्त वित्तीय डेटा भारत में ही रखने के लिए दिशा-निर्देश दिए। इनका पालन करने की अवधि गत 15 अक्टूबर को समाप्त हुई। उम्मीद की जा रही थी कि शायद आरबीआई कुछ और समय देगा इन दिशा-निर्देशों के पालन हेतु। मगर ऐसा हुआ नहीं। इसीसे इसके प्रति गंभीरता का पता चलता है। आज भारत में ई-कॉमर्स, इनफार्मेशन तकनीक, सोशल मीडिया, डिजिटल मनोरंजन आदि क्षेत्रों में विदेशी कंपनियों का आधिपत्य है। प्रत्यक्ष एवं परोक्ष, दोनों ही तरीके से। या तो विदेशी कंपनियां अपना व्यवसाय कर रही हैं, या उनके द्वारा पोषित विदेशी निवेश यह कार्य कर रहा है। यही चिंता का विषय भी है।

व्यापार करने की छूट एक अलग बात है। डेटा के उपयोग में प्राथमिकता अलग बात। मिसाल के तौर पर अगर वित्तीय पेमेंट वाली कंपनी जान पाए कि कितने लोग भविष्य में किस एयरलाइंस की टिकट अधिक बुक कर रहे हैं, तो यह विश्लेषण निवेश हेतु एक महत्त्वपूर्ण सूचना है। ऐसे में इस प्राइस सेंसिटिव इनफार्मेशन का दुरुपयोग हो सकता है। इसी प्रकार किस सिनेमा चेन की टिकट पेमेंट गेटवे से अधिक बुक हो रही है, यह जानकारी भी प्राइस सेंसिटिव कैटेगरी में आएगी। यही नहीं, कार्ड पेमेंट और धारक के मूवमेंट से सुरक्षा संबंधित सूचना भी लीक हो सकती है। कुछ विशेषज्ञ इसे ‘‘कंज्यूमर केंद्रित’ मान रहे हैं, जो मेरे विचार से उचित नहीं है।

डेटा संप्रभुता सुरक्षा से जुड़ा हुआ यह मामला भी है। आर्थिक सुरक्षा के अलावा नीतियों के सफल होने या न होने की पूर्वसूचना भी डेटा से हासिल हो सकती है। जैसे आयुष्मान भारत या मनरेगा में होने वाली डिजिटल पेमेंटके रुझान से भविष्य के राजनैतिक परिदृश्य को भी भांपा जा सकता है। नीतियों की सफलता सत्ता में दुबारा आने की संभावना को प्रदर्शित करती है। अन्यथा नहीं। यह बहुत संवेदनशील मामला है। इसके अलावा, एक तर्क इस बात का भी दिया गया है कि कानून का अनुपालन कराने वाली संस्थाओं को डेटा हासिल करने में लगातार कठिनाई आ रही थी। डेटा जिस देश में रखा जाएगा उसकी उपलब्धता उस देश के कानूनों के अनुसार ही दी जाती है। अपने देश में हुई किसी लेन-देन की जानकारी हेतु विदेशी सरकार के पास प्रतिवेदन करना कोई अच्छी स्थिति नहीं कही जा सकती जबकि उस लेन-देन में उस देश का कोई नागरिक ही शामिल न हो।

इन सब बातों से डेटा के महत्त्व का पता चलता है। जो चीज महत्त्वपूर्ण होती है, वह कीमती भी होती है। कुछ विशेषज्ञों के विचार से भारत डेटा के मामले में विश्व औसत से दुगुनी गति से वृद्धि कर रहा है। इस कीमती डेटा पर हम अपनी संप्रभुता कायम कर सकें तो हम इस नये ‘‘एसेट क्लास’ में विश्व में दूसरे बड़े निवेशक होंगे। दूसरी तरफ, सूचना के आदान-प्रदान में सुगमता में बाधा की बात को कह कर इसका विरोध भी हो रहा है। मुक्त व्यापार का विरोधी माना जा रहा है। मसला भारत-अमेरिकी संबंधों पर भी प्रभाव डालता दिख रहा है।

कुछ अमेरिकी राजनयिकों ने इस संबंध में भारत पर दबाव बनाने की कोशिश भी की है। वीसा और मास्टरकार्ड जैसी बड़ी पेमेंट कंपनियों ने अभी दिशा-निर्देशों का अनुपालन नहीं किया है, और वह कुछ टाल-मटोलु रवैया अपना रही हैं, जिसमें प्रमुख है कि डेटा की एक ‘‘मिरर इमेज’ दी जा सकती है। आरबीआई और सरकार ने इस सुझाव के प्रति कोई सकारात्मक संकेत नहीं दिया है, और यह उचित ही है। भारत के इस पक्ष को अमेरिकी कंपनी ‘‘डेल’ के माइकल डेल ने हालिया इंटरव्यू में उचित मानते हुए कहा है कि डेटा की सुरक्षा और संप्रभुता एक महत्त्वपूर्ण मांग है, जो भारत ने उठाई है।

यह मांग नियंतण्र स्थिति धारण कर सकती है, जब अन्य देश भी इसी तरह की मांग करने लगें। हालांकि माइकल डेल का कथन उन देशों के लिए है, जो ‘‘डेटा स्थानीयकरण’ के संबंध में उदासीन हैं। चीन, जर्मनी और रूस ‘‘डेटा स्थानीयकरण’ के संदर्भ में बहुत पहले ही नियम बना चुके हैं, और वह इस संदर्भ में काफी गंभीर हैं। ध्यान देने वाली बात यह भी है कि बड़ी चीनी कंपनी अलीबाबा ने भारत के पक्ष का समर्थन किया है। अलीबाबा भारतीय कंपनी पेटीएम में बड़ी निवेशक है, और ‘‘डेटा स्थानीयकरण’ का पालन कर रही है। ट्रेड वॉर के बनते माहौल में भारत का यह कदम थोड़ा थोड़ा स्ट्रेटेजिक नजर आ रहा है। इसे पहले उठाया जाना चाहिए था। ट्रंप प्रशासन ही जब मुक्त व्यापार से वापस लौट रहा है, तो भारत को प्रत्येक प्रकार का हक है कि ऐसा कदम उठाने से पीछे न हटे जिसमें वह अमेरिकी दबाव में नजर न आए और अपनी संप्रभुता के सिद्धांत में डेटा को भी समाहित करके उसे संपूर्ण बनाए।

 

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