प्रतिस्पद्र्धा अधिनियम के बेलगाम घोड़े पर लगाम कसना जरूरी

स्रोत: द्वारा सोमशेखर सुंदरेशन: बिज़नेस स्टैण्डर्ड

सरकार ने प्रतिस्पद्र्धा अधिनियम 2002 की समीक्षा के लिए एक समिति नियुक्त की है जो बदलाव के लिए जरूरी सुझाव भी देगी। यह एक महत्त्वपूर्ण अवसर है क्योंकि इस दिशा में काफी कुछ किए जाने की जरूरत है। बाजार कदाचार से संबंधित प्रावधान मई 2009 में लागू किए गए थे जबकि नियमन से संबंधित प्रावधान जून 2011 में प्रभावी हुए थे। इन दोनों क्षेत्रों की गहन समीक्षा और समुचित हस्तक्षेप की जरूरत है। इस लेख में पांच बिंदुओं पर गौर करेंगे।

पहला, इस कानून का ढांचा काफी धुंधला है। कानून का 'प्रतिस्पद्र्धा पर समुचित प्रतिकूल असर' वाले खंड में किसी विलय को नामंजूर करने या बाजार कदाचार की पुष्टि के प्रावधान हैं जिनकी व्यापक व्याख्या हो सकती है। अमूमन किसी भी तथ्य को इसमें जबरन फिट किया जा सकता है या बाहर रखा जा सकता है, सब कुछ इस पर निर्भर करता है कि नतीजा क्या आता है? ऐसे मामले भी हैं जिनमें कीमत या उत्पादन में समानांतर गतिविधयों के साथ कारोबारी संगठन की मौजूदगी के आधार पर यह नतीजा निकाला गया कि यह एक कार्टेल (कारोबारी गुट) है। ऐसे भी मामले हैं जिनमें दूसरे तथ्यों और परिस्थितियों के आधार पर कार्टेल के अभाव का निष्कर्ष भी निकाला गया। समय-समय पर आए अदालती फैसले इस कानून की व्याख्या करते रहे हैं लेकिन अब इन पहलुओं को कानून की शक्ल देने की जरूरत है।

दूसरा, प्रतिस्पद्र्धा अधिनियम में प्रतिस्पद्र्धा आयोग के कई पीठ बनाने का प्रावधान रखा गया था लेकिन वक्त के साथ आयोग के सभी सदस्य सुनवाई में हिस्सा लेने लगे हैं। अब समय आ गया है कि आयोग के अलग पीठ बनाने के बारे में सोचा जाए और हरेक पीठ में तीन सदस्यों की मौजूदगी अनिवार्य हो। लेकिन ऐसा करने के बजाय पूरे आयोग में ही महज तीन सदस्य रखने की मंशा नजर आ रही है। अगर ऐसा होता है तो यह बड़ी गलती होगी। अगर आयोग में अधिक सदस्य होते हैं तो सोच में विविधता भी आएगी लेकिन आयोग सदस्यों वाले पीठ के तौर पर सुनवाई करेगा। इससे आयोग पर काम का बोझ भी कम होगा। किसी भी हाल में आयोग के सभी सदस्य हरेक मामले की एक साथ सुनवाई तो कर नहीं पाते हैं। यह एक सीधा-सादा लेकिन अहम सुधार है।

तीसरा, जुर्माना लगाने का मुद्दा अब भी बेलगाम घोड़ा बना हुआ है। इस कानून के मुताबिक प्रतिस्पद्र्धी कानूनों के उल्लंघन से हुई राजस्व क्षति का एक हिस्सा पेनल्टी के तौर पर लगाया जाना चाहिए लेकिन लगातार यह जुर्माना आरोपी कंपनी के कुल राजस्व या संबंधित कारोबार से हासिल राजस्व पर लगाया जाता रहा है। मसलन, कानून का उल्लंघन भारत के किसी राज्य में किया गया हो लेकिन संबंधित कंपनी के वैश्विक राजस्व के आधार पर जुर्माना लगा दिया जाए। इसके चलते भारी जुर्माना लगाने से संबंधित खबर सुर्खियां बन जाती है लेकिन अपील में जाने पर मामला पलट जाता है। इस कानून में जुर्माना लगाने से संबंधित सिद्धांत पूरी तरह स्पष्ट कर देना चाहिए ताकि ऐसी समस्या पैदा ही न हो।

चौथा, कानून में यह पूरी तरह साफ नहीं है कि कथित बाजार कदाचार और संभावित कदाचार के प्रति किस तरह का अलग रवैया अपनाया जाए। स्वाभाविक अल्पाधिकार वाले बाजार में बड़ा हिस्सा रखने वाली किसी कंपनी के प्रतिस्पद्र्धा संबंधी कदाचार में लिप्त होने के बारे में फैसला करने के लिए वास्तविक तथ्यों की पड़ताल जरूरी होती है। दूसरी तरफ, किसी विलय योजना को मंजूरी देते समय यह भी देखना होता है कि कहीं उस विलय के चलते भविष्य में एकाधिकार की स्थिति तो नहीं बनेगी। पहले से ही वर्चस्व रखने वाली कंपनियों का अपने प्रभाव के दुरुपयोग से जुड़े मामलों में अनुपात और सिद्धांतों का इस्तेमाल करने से अवांछित एवं अनुचित हालात बन सकते हैं।

एक प्रस्तावित परिस्थिति के आकलन में शामिल किए गए कारक कथित कदाचार की जांच से जुड़े मामलों में भी मददगार हो सकते हैं। लेकिन वे कभी भी भावी कदाचार रोकने के लिए स्वत:सिद्ध उपाय नहीं हो सकते हैं।  अंत में, प्रतिस्पद्र्धा अधिनियम संसद द्वारा निर्मित इकलौता कानून है जिसमें दीवानी एवं फौजदारी प्रक्रिया के बीच पृथक्करण के लिए कानूनी शब्दावली का मिला-जुला इस्तेमाल किया गया है। खास तौर पर भारत में किसी भी दूसरे कानून में 'पेनल्टी' शब्द का इस्तेमाल दीवानी मौद्रिक दंड के लिए किया जाता है। दीवानी अदालत का दर्जा रखने वाले नियामक भी पेनल्टी लगा सकते हैं। इसी तरह भारत के अन्य कानूनों में 'फाइन' शब्द का इस्तेमाल आपराधिक मौद्रिक दंड के लिए ही किया जाता है जिसे केवल फौजदारी अदालतें ही लगा सकती हैं। फौजदारी मामलों में आरोप साबित करने के लिए 'संदेह से परे' साक्ष्यों की जरूरत होती है जबकि दीवानी मामलों में 'संभावनाओं की प्रचुरता' को भी साक्ष्य मान लिया जाता है।

हालांकि जब आपराधिक प्रक्रिया में इस्तेमाल साक्ष्यों का स्तर ऊंचा होने के आधार पर कोई जुर्माना लगाया जाता है तो कानूनी कलंक भी बड़ा होता है। दूसरे कानूनों में वर्णित निर्योग्यताएं भी रफ्तार पकड़ती हैं। कंपनी कानून जैसे अन्य कानूनों में जब 'फाइन' शब्द का इस्तेमाल होता है तो उससे एक धब्बा भी लगेगा। प्रतिस्पद्र्धा अधिनियम में सजा के लिए निहित प्रावधानों का इस्तेमाल भारतीय प्रतिस्पद्र्धा आयोग कर सकता है जो एक आपराधिक अदालत न होकर दीवानी अदालत का दर्जा रखता है। इसके बावजूद आयोग को जुर्माना लगाने का अधिकार मिला हुआ है। यह एक कानूनी खामी है जिसे दुरुस्त करने की जरूरत है क्योंकि यह भारतीय कानून व्यवस्था के व्यापक ढांचे की नाकामी को दर्शाता है। 'फाइन' शब्द को बदलकर पेनल्टी कर देना चाहिए ताकि प्रतिस्पद्र्धा आयोग दीवानी प्रक्रिया का समुचित पालन कर सके और समुचित दीवानी मामलों में गैर-आपराधिक दंड दे सके।

 


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