जलवायु परिवर्तन और नैतिकता का द्वंद्व

स्रोत: द्वारा नितिन देसाई: बिज़नेस स्टैण्डर्ड

वैश्विक तापमान में वृद्धि को 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित रखने की चर्चा हो रही है। इस बारे में जलवायु परिवर्तन पर गठित अंतर-सरकारी पैनल (आईपीसीसी) की आई हालिया रिपोर्ट में तीन महत्त्वपूर्ण बिंदु रेखांकित किए गए हैं। पहला, वैश्विक तापमान में वृद्धि को 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित रखने के लिए हमें अगले 10-12 वर्षों में कोयला एवं अन्य जीवाश्म ईंधनों का इस्तेमाल रोकना होगा। यह सैद्धांतिक तौर पर तो संभव है लेकिन व्यवहार में लगभग नामुमकिन है। इसकी वजह यह है कि जीवाश्म ईंधनों के उत्पादन एवं उपयोग में बड़े पैमाने पर निवेश हो रखा है और निवेश की योजना भी है।

दूसरा, अगर ताप वृद्धि को 2 डिग्री सेल्सियस के स्तर तक ही सीमित रखा जाता तो इसमें बड़े जोखिम भी हैं। जल संकट, कई उष्णकटिबंधीय फसलों पर विपरीत असर, मछली पकडऩे की दर में वैश्विक गिरावट, समुद्र के जल स्तर में वृद्धि और अंटार्कटिका एवं ग्रीनलैंड में हिमखंडों के टूटने का खतरा बढ़ जाएगा। तीसरा, हम वर्ष 2030 तक प्रभावी पेरिस समझौते में स्वीकृत 2 डिग्री सेल्सियम की ताप वृद्धि के लक्ष्य को भी हासिल करने की राह पर नहीं हैं। अगर हम मौजूदा रफ्तार से ही चलते रहे तो इस सदी के अंत तक वैश्विक तापमान में 3-4 डिग्री सेल्सियस तक की वृद्धि हो जाएगी।

अब यह साफ हो चुका है कि आने वाले वर्षों में हमें धरती के तापमान में 2 डिग्री सेल्सियस से भी अधिक वृद्धि और जलवायु अस्थिरता देखने को मिलेगी। इस दौरान झुलसाती हवाओं, तूफानी बारिश, चक्रवाती तूफान और बारंबार बाढ़ एवं सूखे की स्थितियों में तेजी आएगी। आईपीसीसी के पांच आकलनों में से हरेक खौफनाक स्थिति दिखाता है और पिछले की तुलना में अधिक पुख्ता लग रहा है। हमें अब बखूबी मालूम है कि कौन से कदम तत्काल उठाने हैं। विवाद का मसला यह है कि ये कदम कौन और कब उठाएगा और उसका खर्च कौन उठाएगा?

जलवायु परिवर्तन का प्रबंधन एक जीरो-सम गेम ही है क्योंकि ताप वृद्धि को सीमित रखने के लिए निर्धारित किसी भी लक्ष्य के लिए उपलब्ध कुल कार्बन बजट तय होता है।2 डिग्री के लक्ष्य के लिए कार्बन बजट करीब 1,320 गीगाटन कार्बन डाई ऑक्साइड होगा जो मौजूदा उत्सर्जन दर से 30 वर्षों में खत्म हो जाएगा। वैश्विक समुदाय ने हरेक देश की अनुमेय हिस्सेदारी निर्धारित करने पर सहमति के बगैर ही इस केक को साझा करने की चाहत दिखाई है। स्वैच्छिक संकल्पों की मौजूदा व्यवस्था हरेक देश की भलमनसाहत पर ही निर्भर है।

लेकिन अब इससे आगे बढऩे और जलवायु नैतिकता को बहस का केंद्रीय विषय बनाने का वक्त आ गया है। यह कोई असामान्य मांग नहीं है। हमने मानवीय एवं मानवाधिकार के मसलों पर चली वैश्विक चर्चाओं में नैतिकता की केंद्रीयता को स्वीकार किया है। हमें यह भी पता है कि दृश्य-जगत में उत्पन्न समस्याएं व्यवहार में निष्पक्षता एवं दायित्व के कुछ सिद्धांतों के ही माध्यम से हल की जा सकती हैं। जलवायु परिवर्तन वैश्विक स्तर पर व्याप्त एक साझा खतरा है जिससे हमें राष्ट्रीय सरकारों के समूह के रूप में नहीं बल्कि एक वैश्विक समुदाय के तौर पर ही निपटना होगा।

दायित्व साझा करने की बुनियाद संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन प्रारूप समझौते में निहित है जिसमें 'समान लेकिन विविध दायित्वों एवं निजी सामथ्र्य' सिद्धांत का जिक्र है। हमें दोषसिद्धता, क्षमता और प्रभाव में अंतर को ध्यान में रखते हुए पीढिय़ों, देशों और व्यक्तियों के बीच समानता सुनिश्चित करने के लिए यह सिद्धांत लागू करना होगा। पहले पीढिय़ों के बीच समता पर गौर करते हैं। यह सच है कि अजन्मे लोग मौजूदा फैसलों पर कोई भी असर नहीं डालते हैं लेकिन भविष्य में पैदा होने वाले बच्चों पर कहीं गहरा असर पड़ेगा। तकनीकी प्रगति के चलते वे इस समस्या से कहीं बेहतर तरीके से निपट सकेंगे। लेकिन बुनियादी नतीजा यही निकलता है कि भावी पीढिय़ों को पेश आने वाली समस्याओं के लिए हम सभी अमीर-गरीब जिम्मेदार होंगे, लिहाजा उन खतरों को कम करना हमारा ही दायित्व बनता है। इस दौरान हमें यह सुनिश्चित करना है कि जियो-इंजीनियरिंग जैसे कदम नए जोखिम न पैदा कर दें।

देशों के बीच समता का मसला जलवायु सहयोग पर हुई तमाम वैश्विक वार्ताओं के केंद्र में रहा है। वातावरण में ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन से जलवायु परिवर्तन की स्थिति पैदा होने को आधार बनाते हुए विकासशील देश पिछले उत्सर्जनों के लिए विकसित देशों को जिम्मेदार बताते रहे हैं। लेकिन विकसित देश इसे बाध्यकारी या स्वैच्छिक राष्ट्रीय दायित्वों के निर्धारण का आधार बनाने से इनकार करते रहे हैं। इस दिशा में सार्थक कदम उठा पाने की देशों की क्षमता में अंतर होने की बात स्वीकार की जाती है लेकिन केवल निर्धनतम एवं अविकसित देशों के ही मामले में होता है। जलवायु परिवर्तन पर देशों के असर में बड़ा अंतर है। इसके अलावा एक नैतिक पहलू भी है कि बेहद छोटे एवं गरीब देशों की किस तरह और किसके द्वारा मदद पहुंचाई जानी चाहिए? अभी तक वैश्विक वार्ताओं में इस मसले पर बहुत कम चर्चा ही हुई है।

राष्ट्रों के बीच दोषसिद्धता, क्षमता और असर में अंतर को आधार बनाने का तर्क धनी एवं गरीब लोगों के बीच जिम्मेदारी तय करते समय भी लागू होना चाहिए। खेती पर निर्भर विशाल आबादी वाले उष्णकटिबंधीय देशों में तो समृद्ध एवं निर्धन लोगों के बीच प्रभाव-भेद काफी अधिक होगा। गरीब परिवारों के स्वास्थ्य एवं आजीविका पर इसका अधिक असर होगा क्योंकि वे बढ़े हुए तापमान एवं विकट प्राकृतिक घटनाओं में अपना बचाव नहीं कर सकेंगे। लेकिन लोगों के बीच दायित्व साझेदारी को वर्तमान दोषसिद्धता एवं क्षमता पर ही निर्भर रखना होगा क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति को अपने पूर्वजों की तरफ से विरासत में मिली संचयी दोषसिद्धता को परिभाषित करना एवं मापना काफी मुश्किल है।

बातचीत का संभावित नजरिया यही होगा कि पूरी दुनिया को एक समुदाय के तौर पर देखा जाए और राष्ट्रीय सीमाओं से परे व्यक्तियों के बीच समानता पर ध्यान दिया जाए। इससे हम मौजूदा दोषसिद्धता और क्षमता के आधार पर जिम्मेदारी तय कर सकते हैं। वैसे दायित्व निर्धारण में कुछ भूमिका अतीत के उत्सर्जन के लिए दोषी ठहराए जाने की भी हो सकती है। आखिर प्रदूषण फैलाने वाले को ही दंड भुगतना पड़ता है।  हालांकि जलवायु परिवर्तन पर होने वाली वैश्विक वार्ताओं में नैतिक पहलू को शामिल करना अमेरिका को रास नहीं आएगा। वह दशकों से इस राह में बाधा बना हुआ है। इसी तरह चीन जैसे देशों को भी दायित्व का बोझ बढऩे से यह पसंद नहीं आएगा।

कुछ नागरिक समाज समूह बड़े एवं छोटे देशों को एक साथ लाकर आत्म-केंद्रित एवं अनमने ढंग से काम करने की प्रवृत्ति से आगे बढऩे की शुरुआत कर सकते हैं। एक साझा बहुराष्ट्रीय योजना बनाने का लक्ष्य रखा जाना चाहिए जो वर्तमान और भविष्य की पीढिय़ों के बीच इंसाफ का माहौल बनाना चाहती हो। अब समय आ गया है कि हम जलवायु परिवर्तन के बारे में दूसरों से अपेक्षित कार्यों के बजाय खुद किए जाने वाले कार्यों पर अधिक ध्यान दें।

 


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