आरसीईपी भारतीय उद्योग के लिए होगा अच्छा!

स्रोत: द्वारा डॉ नौशाद फोब्र्स: बिज़नेस स्टैण्डर्ड

क्षेत्रीय समग्र आर्थिक भागीदारी (आरसीईपी) दक्षिण-पूर्वी एशियाई संगठन आसियान के दस सदस्य देशों, जापान, दक्षिण कोरिया, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, चीन और भारत को एक सूत्र में बांधने की कोशिश है। ये 16 देश संयुक्त रूप से वैश्विक जीडीपी एवं कारोबार के एक तिहाई से अधिक हैं और इनकी सामूहिक आर्थिक वृद्धि बाकी दुनिया से दोगुनी है। सिंगापुर में मंत्री-स्तरीय बैठक के साथ आरसीईपी के लिए चर्चाओं का दौर अब अहम मुकाम तक पहुंच चुका है। सवाल है कि आरसीईपी क्या भारत और भारतीय उद्योग के लिए अच्छा है? आरसीईपी पर लंबित चर्चाओं में भारत के लिए कितनी संभावनाएं हैं और क्या ऐसा कोई शाश्वत बिंदु है जिसकी हमें जरूरत है?

पहला, यह स्पष्ट होना चाहिए कि दुनिया विभिन्न क्षेत्रीय व्यापार समझौतों (आरटीए) से भरी पड़ी है। विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) ने 400 से अधिक आरटीए को मान्यता दी हुई है। इन समझौतों के लिए अलग-अलग कूटनाम भी हैं। आसियान के साथ मुक्त व्यापार समझौता (एफटीए) होने के अलावा भारत का जापान और दक्षिण कोरिया के साथ समग्र आर्थिक भागीदारी समझौता (सीईपीए) है और ऑस्ट्रेलिया एवं न्यूजीलैंड के साथ भी ऐसे समझौते की बात चल रही है। इन समझौतों को जिस नाम से भी जाना जाए, इनके प्रावधान अमूमन एक जैसे होते हैं। सभी समझौतों में उत्पादों के व्यापार के साथ कुछ निर्दिष्ट सेवाओं के कारोबार भी समाहित होते हैं।

वे व्यापार वर्गीकरण एवं सुगमता, गैर-शुल्क अवरोधों, बौद्धिक संपदा, प्रतिस्पद्र्धा नीति, निवेश नीति और विवाद समाधान जैसे पहलू शामिल होते हैं। आरसीईपी भागीदार देशों की संख्या और दायरे दोनों ही पैमाने पर बेहद महत्त्वाकांक्षी योजना है। इसमें 16 देशों को शामिल करने की योजना है जिससे इसका दायरा यूरोपीय संघ से भी बड़ा हो जाता है। इसके अलावा इसमें उत्पादों के व्यापार से आगे जाने का भी उल्लेख है। आरसीईपी के 16 वार्ताकारों में से केवल भारत और चीन ही ऐसे हैं जिनके बीच द्विपक्षीय आरटीए नहीं है। इसका मतलब है कि हमारा कारोबार 15 में से 14 देशों के साथ पहले से ही आरटीए के दायरे में है। लेकिन चीन एक बड़ा अपवाद है और बाकी 14 देशों की तुलना में चीन को अपने बाजार तक कम पहुंच देना और अधिक समायोजन अवधि वाले समझौते की रूपरेखा पहले से ही मौजूद है।

दूसरा, यह धारणा है कि भारत जिन 17 एफटीए का हिस्सा है वे भारतीय उद्योग के लिए उतने लाभदायक नहीं साबित हुए हैं। इस दावे के पक्ष में यही कहा जाता है कि एफटीए वाले देशों के साथ कारोबार में निर्यात से अधिक हमारा आयात बढ़ा है। यह बात सच है लेकिन उद्योग मंडल सीआईआई के एक हालिया अध्ययन से पता चलता है कि चीन के साथ एफटीए नहीं होने पर भी हालात ऐसे ही हैं। वर्ष 2017-18 में चीन के साथ हमारा व्यापार घाटा 60 अरब डॉलर से भी अधिक रहा था। यह व्यापार घाटा तो आसियान के सभी सदस्यों, जापान, दक्षिण कोरिया, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड के साथ हमारे कुल व्यापार घाटे से भी अधिक है। इसका मतलब है कि हमारे व्यापार घाटे की वजह एफटीए नहीं है। अगर मध्यवर्ती उत्पादों का आयात अच्छा-खासा है तो नकारात्मक व्यापार घाटा अनिवार्य रूप से खराब नहीं होता है। मिल्टन फ्रीडमैन ने वर्षों पहले कहा था कि आप निर्यात को खा नहीं सकते हैं। खाने के काम तो आयात ही आता है। यानी, उपभोक्ताओं को उत्पादों के निर्यात से अधिक फायदा उनकी उपलब्धता से होता है।

ऐसे में हमें क्या करना चाहिए? गत चार वर्षों में रुपये की वास्तविक प्रभावी दर 20 फीसदी तक गिर चुकी है। इससे आयात 20 फीसदी तक सस्ता हो चुका है जबकि निर्यात उतना ही महंगा हुआ है? पिछले आठ महीनों में हमने चार बार आयात शुल्क बढ़ाकर संरक्षणवादी रुख अपनाया है जो 25 वर्षों के आर्थिक सुधारों को पलीता लगाता है। शंकर आचार्य ने इस तरफ ध्यान आकृष्ट किया है कि भारतीय उद्योग को संरक्षण देने की कोशिशें आयात और निर्यात दोनों को ही नुकसान पहुंचाएंगी। इससे हम वैश्विक बाजार में कम प्रतिस्पद्र्धी और कम गतिशील बन जाते हैं। सबूत के लिए हम अपने ही इतिहास पर नजर डाल सकते हैं।

वर्ष 1991 में भारतीय अर्थव्यवस्था की हालत मौजूदा समय की परछाई भर थी। उस समय उपभोक्ताओं को घटिया उत्पादों के लिए भी अधिक रकम चुकानी पड़ती थी और हमारी कंपनियां बाकी दुनिया की कंपनियों के मुकाबले बहुत ही छोटी हुआ करती थीं। लेकिन अर्थव्यवस्था को आयात और निवेश के लिए खोलने के बाद से लंबा सफर तय हो चुका है। भले ही 2018 में वैश्विक व्यापार में भारतीय हिस्सेदारी महज 1.5 फीसदी है लेकिन यह 1991 के 0.5 फीसदी स्तर की तिगुनी है। एक औसत भारतीय 1991 की तुलना में आज 10 गुना अधिक संपन्न है। संदेश साफ है: व्यापार में खुलेपन से औद्योगिक क्षेत्र प्रतिस्पद्र्धी बनता है। निर्यात और आर्थिक प्रगति भी इसका अनुकरण करेगी। लिहाजा डॉलर के मुकाबले रुपये में 20 फीसदी की गिरावट और होने  दीजिए। इसके साथ ही हमें स्टील, कपड़ा मोबाइल और अन्य उत्पादों पर हाल में लगा आयात शुल्क हटा देना चाहिए। इससे हमारे उद्योग की प्रतिस्पद्र्धात्मक क्षमता बढ़ाने में मदद मिलेगी।

दूसरा, कंपनियों को तकनीक और अंतरराष्ट्रीय बाजार में निवेश करने की जरूरत है। ऐतिहासिक कारणों से समकक्ष देशों की तुलना में भारतीय उद्योग में कुशलता और पूंजी की सघनता है। ऐसे में हम शोध एवं विकास में निवेश से ही विनिर्माण प्रतिस्पद्र्धा बढ़ा सकते हैं। भारतीय उद्योग जगत जीडीपी का केवल 0.3 फीसदी ही आंतरिक शोध एवं विकास पर लगाता है जबकि वैश्विक औसत 1.5 फीसदी है। हमें अपनी प्रतिस्पद्र्धी क्षमता बढ़ाने के लिए शोध एवं विकास निवेश को पांच गुना करना होगा।

हमें पूरी दुनिया को अपना बाजार बनाने के लिए अंतरराष्ट्रीय कारोबार में भी निवेश करना चाहिए। म्यांमार, श्रीलंका, वियतनाम, इंडोनेशिया, ईरान और मलेशिया गए सीआईआई के प्रतिनिधिमंडलों को यही लगा है कि भारतीय उद्योग का हर जगह स्वागत है और उसकी राह भी देखी जा रही है। हरेक देश का यही कहना है कि वे भारतीय कंपनियों की मौजूदगी बढ़ते हुए देखना चाहते हैं। चीन के ठीक उलट भारत के प्रति ऐसी सद्भावना हमारे लिए एक बड़ा अवसर मुहैया कराती है। तीसरा, एफटीए के प्रति हमारा सामान्य नजरिया भी बदलना चाहिए। लंबे समय से एफटीए संबंधी चर्चाओं में हमारी रणनीति भारतीय बाजार तक दूसरे देश की पहुंच सीमित रखने की रही है।

इसके बजाय हमारा मकसद दूसरे बाजारों में अपनी पहुंच बढ़ाने का होना चाहिए। आखिर हम यह कैसे सुनिश्चित कर सकते हैं कि हमारे इंजीनियरिंग उत्पादों को इंडोनेशिया और ईरान में तेल निर्यातक देशों के बराबर पहुंच मिले। हमारी सॉफ्टवेयर कंपनियों को चीन में स्थानीय कंपनियों के बराबर मौका कैसे मिले? हमारे वार्ताकारों को इन सवालों पर गौर करना चाहिए, न कि अपने स्टील या कपड़ा उद्योग को संरक्षण देने पर। भारत की तुलना में आरसीईपी का बाजार आठ गुना बड़ा है। इस संभावित गठजोड़ में शामिल 15 देशों की तरह भारत भी दुनिया को एक बाजार के तौर पर देखकर समृद्ध बन सकता है।

आरसीईपी को लेकर जारी चर्चा हमारे लिए एक सुनहरा अवसर है। भारत को व्यापार वार्ताओं में अक्सर एक अवरोधक के तौर पर देखा जाता रहा है और आरसीईपी के मामले में भी यही राय है। यह धमकी भी दी गई है कि अगर इस साल के अंत तक समझौता नहीं हो पाता है तो भारत के बगैर ही इसे लागू कर दिया जाएगा। हमारी सरकार के शीर्ष स्तर पर इसकी अहमियत समझी जा रही है। वित्त मंत्री अरुण जेटली और वाणिज्य मंत्री सुरेश प्रभु ने लगातार आरसीईपी पर जोर दिया है। ऐसे दौर में जब डब्ल्यूटीओ खतरे में है, आरसीईपी भारतीय उद्योग की संभावित क्षमता को सुरक्षित कर सकता है।

 

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