दूर करने की चुनौती

स्रोत: द्वारा जयंतीलाल भंडारी: राष्ट्रीय सहारा

हाल ही में नियंतण्र वित्तीय सेवा कंपनी क्रेडिट सुइस द्वारा प्रकाशित ताजा अध्ययन में कहा गया है कि दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ रही भारतीय अर्थव्यवस्था में अमीर-गरीब के बीच खाई बढ़ती जा रही है।अति धनाढ्य लोगों की संख्या के हिसाब से भारत का दुनिया में छठा स्थान है। देश के 3400 लोगों की संपत्ति 5 करोड़ डॉलर से अधिक है, जबकि 91 फीसद आबादी निचली श्रेणी में है, और प्रत्येक के पास 10 हजार डॉलर यानी 7.3 लाख रुपये से कम की संपत्ति है। इसी तरह पिछले दिनों जारी गैर-सरकारी संगठन ऑक्सफैम और डवलपमेंट फाइनेंस इंटरनेशनल द्वारा दुनिया में असमानता को कम करने की प्रतिबद्धता के सूचकांक 2018 में कहा गया है कि असमानता को दूर करने में दुनिया के अन्य देशों की तुलना में भारत का प्रदर्शन संतोषजनक नहीं रहा है।

इस सूचकांक में सामाजिक खर्च, कर ढांचा और श्रमिकों के अधिकार संबंधी नीतियों के आधार पर 157 देशों की रैंकिंग में भारत का स्थान 147वां रहा। इस रिपोर्ट में कहा गया है कि दक्षिण करिया, नामीबिया, उरुग्वे जैसे देश असमानता दूर करने के लिए ठोस कदम उठा रहे हैं।56वें पायदान पर स्थित दक्षिण कोरिया के प्रयासों को रेखांकित करते हुए कहा गया है कि पिछले कुछ वर्षो में सामाजिक विकास के कई कार्यक्रम चलाए गए और उनसे श्रमिकों का वेतन बढ़ा तथा बड़ी कंपनियों और सुपर रिच वर्ग पर भारी कर लगाकर मिले पैसों को कमजोर वर्ग के विकास में खर्च किया गया।

गौरतलब है कि ऑक्सफैम इंडिया द्वारा प्रस्तुत भारतीय असमानता रिपोर्ट-2018 में भी कहा गया है कि भारत में 1991 के बाद शुरू हुए उदारीकरण के बाद आर्थिक असमानता और अधिक भयावह होती जा रही है। कहा गया कि वर्ष 2017 में भारत में अरबपतियों की कुल संपत्ति देश की जीडीपी की 15 फीसद के बराबर हो गई है जबकि पांच वर्ष पहले यह 10 फीसद थी। रिपोर्ट के मुताबिक 2017 में देश की जीडीपी 24.40 खरब डॉलर की थी। इसका 15 फीसद हिस्सा अमीरों के खाते में चला गया।

रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत विश्व के सबसे अधिक आर्थिक असमानता वाले देशों में शुमार है। यह स्थिति सारे पैमानों-आय, खपत और संपत्ति-के मामले में है। रिपोर्ट में कहा गया है कि वर्ष 2017 में भारत में जितनी संपत्ति बढ़ी, उसका 73 फीसद हिस्सा देश के एक फीसदी अमीरों के पास पहुंचा। इसी तरह विभिन्न देशों में दुनिया भर में बढ़ती असमानता की चिंताओं से संबंधित शोध अध्ययन करने वाले विश्व के ख्यात शोध संगठन कटक वेल्थ मैनेजमेंट ने पिछले दिनों प्रकाशित अपने एक शोध अध्ययन में कहा है कि भारत में बढ़ती असमानता की चिंताओं के बीच वर्ष 2017 में देश के अमीरों की तादाद में उनकी सामूहिक हैसियत के मुकाबले बेहद तेजी से वृद्धि हुई है।

निश्चित रूप से आर्थिक और सामाजिक असमानता के विभिन्न मापदंडों में पीछे होने के कारण भारत के करोड़ों लोग खुशहाली में भी पीछे हैं। यह चिंता की बात है कि खुशहाल और प्रसन्न देशों की सूची में भारत का क्रम काफी पीछे है।संयुक्त राष्ट्र द्वारा प्रस्तुत ‘‘र्वल्ड हैप्पिनेस रिपोर्ट-2018’ में 156 देशों की सूची में भारत का स्थान 133वां है। पिछले वर्ष 2017 में जारी विश्व हैप्पिनेस रिपोर्ट में भारत 122वें स्थान पर था। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि भारत खुशहाली के मामले में अपने सभी पड़ोसी देशों से पीछे है। र्वल्ड हैप्पिनेस रिपोर्ट की सूची 2015 से 2017 के बीच जीवनशैली समेत छह अलग अलग विधाओं के आधार पर तैयार प्रश्नावली के जवाब के तहत तैयार की गई।

इन आधारों में प्रति व्यक्ति आय, सामाजिक सहयोग, स्वस्थ, जीवन उम्मीद, सामाजिक स्वतंत्रता, उदारता और भ्रष्टाचार का अभाव जैसे ¨बदुओं के आधार पर विभिन्न देशों के लोगों की खुशहाली का मूल्यांकन किया गया है। एक ओर जहां देश के विकास की रफ्तार वर्ष 2018 में 7 फीसदी से ज्यादा रहने और देश के दुनिया में सबसे तेज विकास दर वाला देश रहने की नियंतण्र रिपोर्ट प्रकाशित हो रही हैं, वहीं दूसरी ओर खुशहाली के पैमाने पर र्वल्ड हैप्पीनेस रिपोर्ट की तरह अन्य कई रिपोर्टे बता रही हैं कि आर्थिक-सामाजिक खुशहाली के मुद्दे पर भारत बहुत पीछे है

इसमें कोई दो मत नहीं हैं कि भारत आर्थिक और सामाजिक असमानता को दूर करने के लिए एक के बाद एक अच्छी योजनाएं लागू कर रहा है। इन योजनाओं से देश के करोड़ों लोग लाभान्वित हो रहे हैं। ऐसे में इन विभिन्न आर्थिक-सामाजिक चुनौतियों के बीच इस समय स्पष्ट रूप से अनुभव किया जा रहा है कि देश की अर्थव्यवस्था के विकास की डगर पर बढ़ने के साथ-साथ विकास के लाभ आम आदमी तक पहुंचाने की राह आसान बनाई जानी होगी। देश के आम आदमी के जीवन स्तर, जीवन प्रत्याशा, जीवन की सुरक्षा, गरीब लोगों के संरक्षण, रोजगार के अवसरों में वृद्धि एवं ग्रामीण विकास के लिए और अधिक कारगर प्रयास करने होंगे। साथ ही, सामाजिक असुरक्षा से चिंताग्रस्त होते जा रहे करोड़ों जरूरतमंद सामान्य लोगों के लिए गुणवत्तापूर्ण सार्वजनिक शिक्षा तथा सार्वजनिक स्वास्य सेवा एवं नागरिक सुविधाओं में सुधार सहित उपयुक्त रोजगार योजनाओं की डगर पर सरकार को तेजी से आगे बढ़ना होगा।

साथ ही, देश को भविष्य की ज्ञान-आधारित अर्थव्यवस्था की दिशा में आगे बढ़ने के लिए युवाओं के कौशल प्रशिक्षण कार्यक्रम को धरातल पर लागू करना होगा। इन विभिन्न कदमों से देश के करोड़ों जरूरतमंद लोगों के चेहरों पर खुशियां लाई जा सकेंगी। साथ ही, तेजी से बढ़ती हुई आर्थिक तथा सामाजिक असमानता में कमी लाई जा सकेगी। आशा करें कि अब सरकार गरीबों के लिए बनी तमाम कल्याणकारी योजनाओं को कारगर तरीके से लागू करेगी। ऐसा होने पर ही आर्थिक विकास के साथ-साथ सामाजिक कल्याण के विभिन्न कदमों से अगले वर्ष ऑक्सफेम और डवलपमेंट फाइनेंस इंटरनेशनल द्वारा तैयार किए जाने वाले असमानता के नियंतण्र सूचकांक में भारत कुछ पायदान ऊपर पहुंचा हुआ दिखाई दे सकेगा। आशा की जानी चाहिए कि अब सामाजिक-आर्थिक समानता लाने के लिए देश में लागू विभिन्न योजनाओं के उपयुक्त क्रियान्वयन की डगर पर सरकार तेजी से आगे बढ़ेगी।

 

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