भारत के लिए मुफीद बदलाव

स्रोत: द्वारा के विक्रम राव: राष्ट्रीय सहारा

मालदीव में लोकशाही जीतीभारतमित्र इब्राहीम मोहम्मद सोली की पड़ोसी माल्दीव्स इस्लामी गणराज्य के राष्ट्रपति निर्वाचन में अभूतपूर्व विजय पाना एशियाई परिदृश्य में कई मायनों में प्रगतिशील संकेत है। वर्तमान राष्ट्रपति अब्दुल्लाह यामीन की शिकस्त बीजिंग और इस्लामाबाद को व्यथित करती है। दोनों राष्ट्रों ने अपने तरीके से चुनाव को अपने हितों के माफिक प्रभावित किया था। चुनाव प्रबंधकों के अनुसार साठ प्रतिशत वोटरों ने सत्ता के विरोध में मतदान किया। मुद्दा था तानाशाही बनाम लोकशाही क्योंकि सैकड़ों विरोधी जेल में नजरबंद कर दिए गए थे। वोटरों के उत्साह का आलम यह था कि देर रात तक बूथ के बाहर लाइनें लगी रहीं।

नरेन्द्र मोदी ने अपील की थी कि वोट प्रक्रिया पक्षपातहीन रखी जाए। भारत की चिंता वाजिब थी क्योंकि श्रीलंका, म्यांमार, नेपाल, बांग्लादेश आदि पर चीन का आर्थिक दबाव बढ़ता जा रहा है। मालदीव की मार्फत चीन पश्चिमी भारत पर असर डाल सकता है। पूर्वोतर से पश्चिम-दक्षिण तक भारत की सीमा घिर रही है। अत: मालदीव का चुनाव सरकार की दृष्टि से भी अहम हो गया था। चीन ने यहां कुछ द्वीप खरीद भी लिये हैं। अर्थात चीन और पाकिस्तान ने सभी ओर से (समुद्र, आकाश और धरती) भारत को घेर लिया है। इसी संदर्भ में भारतमित्र का राष्ट्रपति निर्वाचित होना महत्त्वपूर्ण है।

मालदीव के परिवेश में इस द्वीप समूह के भूगोल तथा इतिहास पर एक नजर डालें तो चुनाव परिणाम ज्यादा स्पष्ट होंगे। इब्राहीम के पूर्व भी एक भारतमित्र मोहम्मद नाशीद राष्ट्रपति हुए थे। सलाखों के पीछे से सत्ता की चोटी तक पहुंचने वालों की मिसाल इतिहास में कई मिल जाएंगी। मगर मालदीव में श्रमजीवी पत्रकार मोहम्मद अन्नी नाशीद का राष्ट्रपति निर्वाचित होना अनोखा दृष्टांत था। एशिया के लघुतम राष्ट्र की दीर्घतम अवधि (तीन दशक) तक शासक रहे इकहत्तर वर्षीय मायूम अब्दुल गय्यूम को इकतालीस वर्षीय मोहम्मद नाशीद ने हराया था। इस प्रवालद्वीप वलय में लोकशाही का यह प्रथम प्रयोग था।

मोहम्मद नाशीद ने चौवन प्रतिशत वोट पाकर जीत के दिन ही छियालीस फीसद वोट पाए अपने प्रतिद्वंद्वी गय्यूम के साथ संयुक्त प्रेस कांफ्रेंस में ऐलान किया कि पराजित राष्ट्रपति को राजकाज में माफिक स्थान दिया जाएगा। उनकी मालदीवियन डेमोक्रेटिक पार्टी के प्रफुल्लित सदस्यों ने पार्टी की भगवा पताका लहराकर इसका खैरमकदम किया। उनसे भिन्न रहे पूर्व राष्ट्रपति गय्यूम। श्रीलंका में आरंभिक अध्ययन के बाद काहिरा के अल अजहर विविद्यालय से इस्लामी शास्त्रों का अध्ययन कर उन्होंने शरियत कानून में निपुणता पाई। उग्रवादी मुस्लिम ब्रदरहुड संगठन के प्रणोता सैयद कुतुब से प्रभावित हुए।

फिर लीबिया इस्लामी गणराज्य गए और कर्नल मुअम्मर गद्दाफी के निजामे मुस्तफा से अभिभूत हुए। कम्युनिस्ट उत्तर कोरिया जाकर तानाशाह किम इल सुंग की शासन व्यवस्था का अध्ययन किया। मालदीव लौटकर एक पार्टी शासन तंत्र रचा, जिसमें वे अकेले राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार होते थे और नब्बे प्रतिशत वोट पाकर चार बार चुने जाते रहे। उन्होंने मालदीव में शरियत कानून को सर्वोच्च बनाया। इस्लामी राष्ट्रों के संगठन (ओआईसी), जो कश्मीर को पाकिस्तान का भूभाग मानता है, में सक्रिय भूमिका निभाई। राष्ट्रमंडल में रहे।

विश्व के इस पूर्णत: इस्लामी देश, जहां अन्य सभी आस्थाएं कानूनन वर्जित हैं, सिर्फ सुन्नी मुसलमान ही नागरिक तथा वोटर हो सकते हैं। राष्ट्र का शासकीय केंद्र भी मस्जिदे सुल्तान मोहम्मद है। इसीलिए मोहम्मद नाशीद की विजय सूफीवादी उदार इस्लाम की फतह थी। अपने चुनावी अभियान में राष्ट्रपति गय्यूम ने प्रचार भी किया था कि उन्हें अपदस्थ कर पश्चिमी देश मालदीव में ईसाइयत थोपने की फिराक में हैं। साल भर से यहां भी मुस्लिम आतंकवादी प्रगट हो गए हैं। गैर-मुस्लिम पर्यटकों पर कातिलाना हमले दर्ज हुए हैं।

दक्षिण में लिट्टेवाला जाफना, उत्तर में मकबूजा मुजफ्फराबाद, पूर्वोत्तर में माओवादी नेपाल और फौज-शासित ढाका तथा तालिबान-ग्रस्त पश्चिमी पंजाब से घिरे भारत पर एक नये छोर से आतंक का साया पड़ने का अंदेशा था। अत: नाशीद के राष्ट्रपति निर्वाचित हो जाने से तब कुछ राहत मिली थी। मोहम्मद नाशीद से दक्षिण पूर्वी राष्ट्रों (सार्क) विशेषकर भारत को आशा बंध जाना स्वाभाविक था कि मालदीव लोकतांत्रिक राह पर अग्रसर होकर विकास मार्ग पर चलेगा। आशंकित मुस्लिम आतंकवाद का कार्यस्थल नहीं बनेगा। नाशीद ने पंद्रह वर्ष गुजारे हैं गय्यूम की जेल में। जेल की एकांत कोठरी में बंद कर उन पर थूका जाता था, बूट की कील से प्रहार होता था, भूखा रखा जाता था। मगर नाशीद हिम्मत नहीं हारे।

नाविक इंजीनियर की डिग्री पाकर बजाय सरकारी नौकरी के नाशीद ‘‘लोकतंत्र लाओ’ संघर्ष के सरबराह बने। श्रीलंका और ब्रिटेन में निर्वासित जीवन बिताया। प्रतिबंध की अवधि खत्म हुई तो मालदीव लौट आए। राजधानी माले के पूर्वी भाग में ऐतिहासिक चौखंभा स्मारक के बगीचे में दो दशकों से दिन-रात विरोध प्रदशर्न, धरना और गिरफ्तारी देते रहे। भारत में दफा 144 में चार से अधिक प्रदशर्नकारी साथ नहीं आ सकते, मालदीव में यह संख्या केवल तीन है। इसका नाशीद के समर्थकों ने कई बार उल्लंघन किया।

आधुनिक एशिया के सर्वाधिक अवधि तक बंदी रहे लोकतंत्र के सेनानी नाशीद की तुलना लोग नेल्सन मंडेला और सीमांत गांधी खान अब्दुल गफ्फार खान से करते हैं। एमनेस्टी इंटरनेशनल ने उन्हें अंतरात्मा का कैदी कहा। विडंबना रही कि हर देश की स्वाधीनता और लोकतंत्र के सदैव समर्थक रहे भारतवासी मालदीव के बारे में खामोश ही बने रहे। भारतीय शासक शायद इसलिए चुप थे कि मालदीव का राष्ट्रपति इस्लामी कट्टरवादी अब्दुल गय्यूम था। लेकिन अपने अथक संघर्ष से स्वयं यातना झेलकर मोहम्मद नाशीद ने दिखा दिया कि तानाशाही अमानवीय होती है, अपराजेय नहीं। इस्लाम का एक उदारवादी चेहरा भी होता है। उनकी बगावत कामयाब रही। अत: वह लोकतांत्रिक क्रांति कहलाएगी क्योंकि हर सफल विद्रोह इंकलाब कहा जाता है। ऐसा ही नवनिर्वाचित इब्राहीम के साथ भी होगा।

 

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