संसद ने मानवाधिकार संरक्षण संशोधन विधेयक 2019 को मंजूरी दे दी। सरकार ने भरोसा जताया कि राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग और राज्य मानवाधिकार आयोगों को और अधिक सक्षम बनाने में विधेयक के प्रावधानों से मदद मिलेगी। राज्यसभा ने विधेयक को चर्चा के बाद ध्वनिमत से पारित कर दिया। लोकसभा इसे पहले ही पारित कर चुकी है। इस विधेयक पर हुई चर्चा का जवाब देते हुए गृह मंत्री अमित शाह ने विपक्ष के कुछ सदस्यों की इन आपत्तियों को निराधार बताया कि पुनर्नियुक्ति के प्रावधान के कारण यह 'सरकार का आयोग' बन जाएगा। शाह ने कहा कि आयोग के सदस्य की नियुक्ति एक समिति करती है, जिसमें प्रधानमंत्री, लोकसभा के अध्यक्ष, राज्यसभा के उपसभापति तथा संसद के दोनों सदनों के नेता प्रतिपक्ष या सबसे बड़े विपक्षी दल के नेता होते हैं।
 
 
क्या है 
  1. शाह ने कहा कि समिति द्वारा नियुक्ति के बारे में यदि इस तरह के संदेह किया जाएगा तो 'कोई भी लोकतांत्रिक संस्था काम नहीं कर पाएगी।
  2. आयोग के सदस्यों के कार्यकाल को 5 साल से घटाकर 3 साल करने का उद्देश्य है कि खाली पदों को भरा जा सकेगा। उन्होंने पुनर्नियुक्ति के प्रावधानों को लेकर विपक्ष के सदस्यों के संदेहों पर कहा कि इनकी पुनर्नियुक्ति सरकार नहीं नियुक्ति समिति करेगी।
  3. साथ ही आयोग के नियम के तहत इसका कोई सदस्य या अध्यक्ष सरकार के किसी अन्य पद पर नियुक्त नहीं हो सकता है। 
  4. विधेयक के प्रावधान के अनुसार राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष के रूप में ऐसा व्यक्ति होगा, जो सुप्रीम कोर्ट का चीफ जस्टिस रहा हो। उसके अतिरिक्त किसी ऐसे व्यक्ति को भी नियुक्त किया जा सके जो सुप्रीम कोर्ट का जज रहा हो। इसमें आयोग के सदस्यों की संख्या दो से बढ़ाकर तीन करने का प्रावधान है, जिसमें एक महिला हो।
  5. इसमें प्रस्ताव किया गया है कि आयोग और राज्य आयोगों के अध्यक्षों और सदस्यों की पदावधि को पांच वर्ष से कम करके तीन वर्ष किया जाए और वे पुनर्नियुक्ति के पात्र होंगे। 
  6. इस संशोधन विधेयक के माध्यम से आयोग के अध्यक्ष के रूप में ऐसे व्यक्ति को भी नियुक्त करने का प्रावधान किया गया है, जो सुप्रीम कोर्ट का जज रहा है।