सुप्रीम कोर्ट ने धार्मिक स्थलों में यौन उत्पीड़न के मामलों से जुड़ी एक याचिका ठुकराई है। सुप्रीम कोर्ट ने कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न मामलों में कार्रवाई के लिए बनाए गए विशाखा गाइडलाइन को धार्मिक स्थलों में यौन उत्पीड़न के केस में भी लागू करने की मांग ठुकरा दी है। सुप्रीम कोर्ट ने विशाखा फैसले के दिशानिर्देश और जाँच कमेटी के गठन जैसी कई और मांगों को नहीं माना है। कोर्ट ने कहा है कि विशाखा गाइडलाइन का धार्मिक स्थलों पर कैसे विस्तार हो सकता है।
 
 
विशाखा गाइडलाइन्स क्या है ?
  1. कार्यस्थल पर होने वाले यौन-उत्पीड़न के ख़िलाफ़ साल 1997 में सुप्रीम कोर्ट ने कुछ निर्देश जारी किए थे। सुप्रीम कोर्ट के इन निर्देशों को 'विशाखा गाइडलाइन्स' के रूप में जाना जाता है। 
  2. इसे विशाखा और अन्य बनाम राजस्थान सरकार और भारत सरकार मामले के तौर पर भी जाना जाता है। इस फ़ैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि यौन-उत्पीड़न, संविधान में निहित मौलिक अधिकारों का उल्लंघन हैं। इसके साथ ही इसके कुछ मामले स्वतंत्रता के अधिकार के उल्लंघन के तहत भी आते हैं।
  3. 1997 से पहले महिलाएं कार्यस्थल पर होने वाले यौन-उत्पीड़न की शिकायत आईपीसी की धारा 354 (महिलाओं के साथ होने वाली छेड़छाड़ या उत्पीड़न के मामले) और धारा 509 (किसी औरत के सम्मान को चोट पहुंचाने वाली बात या हरकत) के तहत दर्ज करवाती थीं।
  4. सुप्रीम कोर्ट ने विशाखा गाइडलाइन्स के तहत कार्यस्थल के मालिक के लिए ये ज़िम्मेदारी सुनिश्चित की थी कि किसी भी महिला को कार्यस्थल पर बंधक जैसा महसूस न हो, उसे कोई धमकाए नहीं। 
  5. साल 1997 से लेकर 2013 तक दफ़्तरों में विशाखा गाइडलाइन्स के आधार पर ही इन मामलों को देखा जाता रहा, लेकिन 2013 में 'सेक्सुअल हैरेसमेंट ऑफ वुमन एट वर्कप्लेस एक्ट' आया।
  6. जिसमें विशाखा गाइडलाइन्स के अनुरूप ही कार्यस्थल में महिलाओं के अधिकार को सुनिश्चित करने की बात कही गई। इसके साथ ही इसमें समानता, यौन उत्पीड़न से मुक्त कार्यस्थल बनाने का प्रावधान भी शामिल किया गया। 
  7. इस एक्ट के तहत किसी भी महिला को कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न के ख़िलाफ़ सिविल और क्रिमिनल दोनों ही तरह की कार्रवाई का सहारा लेने का अधिकार है।