प्लास्टिक प्रदूषण की समस्या पूरे विश्व के लिए एक बड़ी पर्यावरणीय चिंता बनकर उभर रही है। पर्यावरण में घुले प्लास्टिक के सूक्ष्म कण मनुष्य के शरीर के भीतर पहुंचकर उन्हें नुकसान पहुंचा रहे हैं। दुनिया भर में हर साल 400 मिलियन (लगभग 4 करोड़) टन से अधिक प्लास्टिक का उत्पादन होता है। सौंदर्य प्रसाधन, खाद्य पैकेजिंग, बर्तन आदि जैसे उद्योगों के जरिए भी प्लास्टिक हमारे शरीर में पहुंच कर नुकसान पहुंचा रहे हैं। भारतीय वैज्ञानिकों ने प्लास्टिक के सूक्ष्म कणों का हमारे शरीर पर पड़ने वाले प्रभावों का अध्ययन कर इसके दुष्परिणामों के प्रति आगाह किया है। वैज्ञानिकों के मुताबिक, कचरे का अधिकांश प्लास्टिक डंप यार्ड में क्षीण हो कर पानी में मिल जाता है, जिससे समुद्री पारिस्थितिक तंत्र पर इसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है।
 
 
क्या है 
  1. समुद्री जीवों जैसे- मछली, घोंघे, कछुए आदि के शरीर में इसकी उपस्थिति भी चिंता का विषय है। सीफूड खाने के बाद प्लास्टिक मनुष्यों के शरीर में पहुंच जाता है और वह धीरे-धीरे उनके आमाशय में एकत्र होने लगाता है और मनुष्य कई बीमारियों से ग्रसित होने लगता है।
  2. 'साइंटिफिक रिपोर्ट' में प्रकाशित हुए अध्ययन के मुताबिक, समुद्री जीवों में मौजूद प्लास्टिक के कण इतने सूक्ष्म हैं कि इन्हें खुली आंखों से नहीं देखा सकता। 
  3. ये सूक्ष्म कण भौतिक, जैविक और रासायनिक क्रियाओं के माध्यम से उत्पन्न होते हैं और स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा बन जाते हैं। सी फूड के अलावा प्लास्टिक के सूक्ष्म और अतिसूक्ष्म कण लिपस्टिक, काजल, शैंपू आदि में भी प्रयुक्त होते हैं। हाल के अध्ययनों में नल और बोतलबंद पानी में सूक्ष्म प्लास्टिक के कणों के मिलने की पुष्टि की गई थी।
  4. मनुष्यों में सूक्ष्म प्लास्टिक के प्रभाव का अध्ययन करने वाले वेल्लोर इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी के प्रोफेसर नटराजन चंद्रशेखरन ने कहा कि खाद्य श्रृंखला के अलावा भी मनुष्य प्लास्टिक उत्पादों के साथ संपर्क में रहता है। इससे त्वचा और सांस संबंधी जोखिम बढ़ सकते हैं। 
  5. एक अनुमान के मुताबिक, भारतीय हर साल लगभग 11 किलो प्लास्टिक उत्पादों का विभिन्न रूपों में उपभोग करता है। हालांकि यह एक अमेरिकी या चीनी व्यक्ति की तुलना में बहुत कम है, फिर भी यह एक गंभीर समस्या है।
  6. वैज्ञानिकों ने कहा कि प्लास्टिक के कण हमारे में तो आसानी से पहुंच जाते हैं पर उनके आकार के आधार पर ये कण या तो उत्सर्जित होते हैं या पेट और आंतों में ही फंस जाते हैं या रक्त में स्वतंत्र रूप से बहते रहते हैं, जिससे शरीर के विभिन्न अंगों और ऊतकों तक ये आसानी से पहुंच जाते हैं और शरीर बीमार होने लगता है।
  7. अध्ययन के दौरान प्रो. चंद्रशेखरन और उनके सहयोगियों ने पाया कि प्लास्टिक के कणों से कोशिकाएं तो प्रभावित होती ही हैं साथ ही इससे रक्त के प्रवाह में भी बाधा आती है। ऑस्टि्रयाई वैज्ञानिकों द्वारा किए गए एक अध्ययन से पता चला था कि व्यक्तियों के मल में माइक्रोप्लास्टिक शामिल था।
  8. इसी प्रकार, यूनाइटेड किंगडम स्थित यूनिवर्सिटी ऑफ एक्सेटर के वैज्ञानिकों द्वारा किए गए एक अन्य अध्ययन में किशोरों के मूत्र में बीपीए (बिस्फेनॉल ए) की मात्रा काफी ज्यादा पाई गई। यह प्लास्टिक बनाने के लिए इस्तेमाल होने वाला एक रसायन है। कई अध्ययनों में तंत्रिका तंत्र पर प्लास्टिक के नकारात्मक प्रभावों के बारे में भी बताया गया है।

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