राष्ट्रीय शिक्षा नीति के मसौदे पर देशभर में जारी विमर्श के बीच प्रफेसर एम के श्रीधर ने कहा है कि इसका उद्देश्य भारत और इंडिया के अंतर को कम करना है। प्रफेसर श्रीधर राष्ट्रीय शिक्षा नीति का मसौदा तैयार करने वाली कमिटी के सदस्य भी हैं। एबीवीपी के राष्ट्रीय संगठनमंत्री सुनील आंबेकर ने कहा कि नई शिक्षा नीति सिर्फ कुछ लोगों का अजेंडा नहीं बल्कि इसका निर्माण विभिन्न तबकों के हितधारकों को शामिल करके किया जाना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि भारतीय भाषाओं को बढ़ावा देने से ही राष्ट्रीय एकता मजबूत होगी। 
 
क्या है 
  1. एम के श्रीधर ने कहा, "नीति तथा उसका लागू होना दोनों अलग-अलग विषय हैं। मैं उम्मीद करता हूं कि यह नीति उसी प्रकार लागू होगी जैसी बनाई गई है। 
  2. यह नीति संपूर्ण शिक्षा व्यवस्था को 360 डिग्री तक बदल देगी। पहले 15 वर्ष शिक्षा का बहुत ही अहम हिस्सा होता है। उसका भी ध्यान इसमें रखा गया है। 
  3. 11 वर्ष की उम्र तक सीखने की प्रक्रिया में कमी देखने को मिल रही थी। उसको भी इस के माध्यम से ठीक करने का काम किया जा रहा है। करिकुलम, सो कॉल्ड करिकुलम और एक्स्ट्रा करिकुलम इन सबमें अंतर समाप्त करने का कार्य भी हम इस नीति के माध्यम से कर रहे हैं। 
  4. उन्होंने आगे कहा, "वर्तमान अंडर ग्रैजुएट शिक्षा पद्धति औपनिवेशिक विरासत है, जिसे पूरी तरह से बदले जाने की जरूरत है। हमने लिबरल आर्ट ऑफ एजुकेशन व्यवस्था लागू करने पर जोर दिया है और हम साइंस या आर्ट्स में अंतर नहीं कर रहे हैं। 
  5. हमने इस सिस्टम की जगह एक उदारवादी रुख अपनाने की वकालत की है, जिसमें अलग-अलग स्ट्रीम नहीं होंगे। एक साल पूरे होने पर छात्रों को सर्टिफिकेट, दो साल पूरो होने पर डिप्लोमा, तीन साल के बाद डिग्री और चौथा साल पूरी तरह से रिसर्च अधारित होगा, जिसे पूरा करने के बाद छात्रों को बैचलर ऑफ लिबरल आर्ट्स (ऑनर्स) मिलेगा।
  6. 'इसके लागू होने के बाद किसी भी प्रशासनिक व्यवस्था के पास एक से अधिक दायित्व नहीं रहेगा। सब मात्र एक ही दायित्व का निर्वहन करेगें ताकि एक सफल शैक्षिक प्रकिया का संचालन हो सके। डिग्री ग्रांटिंग ऑटोनोमस महाविद्यालयों की व्यवस्था भी राष्ट्रीय शिक्षा नीति में रहेगी। 

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