दुनियाभर में मौजूद हथियारों के जखीरे में भले ही कमी देखी जा रही हो पर बीते 12 महीनों में परमाणु युद्ध का खतरा काफी बढ़ गया है। कुछ हद तक इसके लिए अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव को भी जिम्मेदार ठहराया जा सकता है। दरअसल, एक नई रिसर्च में दावा किया गया है कि संख्या में भले ही दुनिया के परमाणु हथियारों में कमी आई हो लेकिन तबाही लाने वाले परमाणु युद्ध का खतरा कम होने की बजाय बढ़ गया है। 
 
 
क्या है 
  1. थिंक टैंक स्टॉकहोम इंटरनैशनल पीस रिसर्च इंस्टिट्यूट (SIPRI) ने रिसर्च में पाया है कि दुनिया के 9 परमाणु संपन्न देशों के पास 2018 में 13,865 हथियार थे जबकि एक साल पहले इनकी संख्या 14,465 थी। हालांकि रिसर्चरों का कहना है कि अमेरिका और ईरान के बीच जिस तरह से तनाव बढ़ रहा है उससे दुनिया में परमाणु युद्ध का खतरा पैदा हो गया है। 
  2. एक वैज्ञानिक ने बताया कि कैसे परमाणु संपन्न देश संख्या बढ़ाने की बजाय अब अपने हथियारों की क्षमता को लेकर ज्यादा फिक्रमंद है। SIPRI के असोसिएट सीनियर फेलो हांस एम. क्रिसटेंसन ने कहा, 'यह नई तरीके की आर्म्स रेस है। इसमें हथियारों की संख्या नहीं बल्कि टेक्नॉलजीज पर फोकस है।'
  3. रिपोर्ट के मुताबिक 2018 में रूस, अमेरिका और यूके ने अपने हथियारों की संख्या में कमी की है जबकि चीन, पाकिस्तान, इजरायल और नॉर्थ कोरिया ने अपने शस्त्रागारों में 10 से 20 हथियार बढ़ा लिए हैं। वहीं, फ्रांस और भारत अपने भंडार को क्रमश: 300 और 140 पर बरकरार रखे हुए हैं।
  4. मेल ऑनलाइन की रिपोर्ट के मुताबिक विकसित और परमाणु हथियारों को लेकर ज्यादा सक्रिय देश अब अपने शस्त्रागारों को आधुनिक बनाने का प्रयास कर रहे हैं। 
  5. रूस ऐसा हथियार विकसित करने में जुटा है जो अमेरिका की ऐंटी-मिसाइल शील्ड को भेद सकता है। वहीं अमेरिका रूस को जवाब देने के लिए कम दूरी के नए टैक्टिकल वेपंज विकसित कर रहा है।
  6. ईरान के साथ अप्रसार संधि से अमेरिका के बाहर निकलने के बाद दुनिया के सामने परमाणु युद्ध का खतरा बन गया है। इस बीच, ईरान 27 जून को यूरेनियम संवर्धन की सीमा को पार कर जाएगा। इन हालात को वैश्विक शांति के लिहाज से अच्छा नहीं कहा जा सकता है। 
  7. गौरतलब है कि हाल के वर्षों में परमाणु हथियारों में कमी का श्रेय मुख्य रूप से अमेरिका और रूस को दिया जा सकता है जिनके पास कुल हथियार दुनिया के परमाणु हथियारों का 90 फीसदी से अधिक हैं
  8. यह अमेरिका और रूस के बीच संधि के कारण संभव हो पाया है जिसके तहत हथियारों की संख्या सीमित रखने का प्रावधान है। साथ ही इसमें शीत युद्ध के समय के पुराने हथियारों को खत्म करने का भी प्रावधान है। बहरहाल, START संधि 2021 में समाप्त होने वाली है और चिंताजनक बात यह है कि इसे आगे बढ़ाने पर कोई गंभीर चर्चा नहीं हो रही है। 

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