केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में सामान्य वर्ग के आर्थिक तौर पर कमजोर लोगों को 10 फीसद आरक्षण देने के फैसले का बचाव किया है। केंद्र ने कहा है कि आर्थिक स्थिति के कारण उच्च शिक्षा और रोजगार से वंचित रह गए लोगों को समान अवसर मुहैया कराकर समाजिक समानता को बढ़ावा देने के लिए यह व्यवस्था की गई है। सरकार ने कहा कि नया कानून 1992 के इंद्रा साहनी बनाम केंद्र (मंडल आयोग फैसले के नाम से ज्ञात) के दायरे में नहीं आता है। इसका कारण यह है कि आरक्षण के लिए प्रावधान संविधान संशोधन के बाद किया गया है।
 
क्या है 
  1. केंद्र ने अपने हलफनामे में कहा है, 'संविधान संशोधन (103वां) अधिनियम 2019 समाज में आर्थिक रूप से कमजोर तबके के लोगों को लाभ देने के लिए आवश्यक था। ये लोग आरक्षण के उपलब्ध दायरे में नहीं आते थे। सांख्यिकी के अनुसार भारतीय जनसंख्या में ऐसे लोग बहुत बड़ी संख्या में हैं।'
  2. केंद्र ने कहा है कि समाज के सभी कमजोर वर्ग को न्याय मुहैया कराने के लिए संविधान में उचित संशोधन आवश्यक था। सरकार को समाज में आर्थिक रूप से कमजोर लोगों को शिक्षण संस्थानों और सरकारी नौकरियों में आरक्षण सहित विभिन्न लाभ देने के लिए समर्थ बनाना जरूरी था। समाज के ऐसे लोग मौजूद आरक्षण के दायरे में नहीं आते थे।
  3. केंद्र सरकार ने संविधान संशोधन (103वां) अधिनियम 2019 के खिलाफ दायर कई याचिकाओं के जवाब में हलफनामा दायर किया है। 
  4. याचिकाओं में संशोधन की वैधानिकता को चुनौती देते हुए कहा गया है कि यह इंद्रा साहनी बनाम केंद्र मामले में दिए गए कोर्ट के फैसले का उल्लंघन करता है और यह संविधान के मूल ढांचे के खिलाफ है।