सुप्रीम कोर्ट ने 5 दिसम्बर 2018 को केंद्र सरकार की गवाह सुरक्षा योजना के मसौदे को मंजूरी प्रदान कर दी। शीर्ष अदालत ने कहा कि जब तक संसद इस संबंध में कानून नहीं बनाती, तब तक सभी राज्य इसे लागू करें। जस्टिस एके सीकरी की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि उन्होंने योजना में कुछ बदलाव किए हैं। गवाह सुरक्षा योजना का मुद्दा तब उठा था जब सुप्रीम कोर्ट एक जनहित याचिका की सुनवाई कर रहा था। याचिका में कथावाचक आसाराम से जुड़े दुष्कर्म मामले में गवाहों की सुरक्षा की मांग की गई थी। 19 नवंबर को सुनवाई के दौरान अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने शीर्ष अदालत को बताया था कि योजना के मसौदे को अंतिम रूप दिया जा चुका है और जल्द ही इसे कानून का रूप दे दिया जाएगा। लेकिन तब तक शीर्ष अदालत निर्देश दे कि सभी राज्य इसे लागू करना शुरू करें। वहीं, इस मामले में न्यायमित्र अधिवक्ता गौरव अग्रवाल ने बताया कि केंद्र ने इस योजना का मसौदा सभी राज्यों, राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण (नालसा) और पुलिस अनुसंधान और विकास ब्यूरो (बीपीआरडी) से सलाह-मशविरा करके तैयार किया है।
 
तीन वर्गो में विभाजित किए गवाह
  1. मसौदे में संभावित खतरे के आधार पर गवाहों को तीन वर्गो में विभाजित किया गया है। लिहाजा गवाहों को संभावित खतरे के अनुपात में सुरक्षा मुहैया कराई जाएगी। 
  2. यह सुरक्षा अनिश्चितकाल के लिए न होकर एक निश्चित अवधि के लिए होगी। हालांकि इसकी नियमित समीक्षा भी की जाएगी। इसमें यह भी कहा गया है कि गवाह और आरोपित जांच या मुकदमे के दौरान आमने-सामने न आएं। 
  3. इसके अलावा मुकदमे के जल्द से जल्द निपटारे के लिए सभी संभव कदम उठाए जाएं। योजना में गवाह को पहचान सुरक्षा देने और नई पहचान देने का भी प्रावधान किया गया है।
मालिमथ समिति ने की थी सिफारिश
  1. भारतीय दंड संहिता (आइपीसी) की धारा 195-ए में गवाहों की सुरक्षा का प्रावधान है, लेकिन 2003 में आपराधिक न्याय प्रणाली पर गठित वी. मालिमथ समिति ने अलग गवाह सुरक्षा कानून बनाने की सिफारिश की थी। 
  2. 2006 में भारतीय विधि आयोग ने अपनी 198वीं रिपोर्ट में गवाह सुरक्षा कानून का मसौदा दिया भी था।
कई देशों में पहले से है योजना
  1. अमेरिका, ब्रिटेन, चीन, इटली, कनाडा, हांगकांग और आयरलैंड जैसे देशों में पहले से गवाह सुरक्षा योजना लागू है।

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