ले विश्वयुद्ध में शामिल 15 लाख सैनिकों की बहादुरी की गाथा अब उन जगहों पर जाकर जान सकेंगे जहां युद्ध लड़ा गयायूनाइटेड सर्विस इंस्टिट्यूशन ऑफ इंडिया (यूएसआई), विदेश मंत्रालय और ब्रिटिश हाई कमिशन मिलकर बेटल फील्ड टूरिजम को प्रमोट कर रहा है। जिससे देश के लोगों को मालूम चल सके कि भारतीय सैनिकों ने कहां-कहां लड़ाई लड़ी हैनवंबर में पहले विश्वयुद्ध के खत्म होने के 100 साल पूरे होने पर कई कार्यक्रम की तैयारी है ताकि देश अपने सैनिकों के बारे में जान सके और उन्हें याद करे।
 
क्या है   
  1. यूएसआई के डायरेक्टर लेफ्टिनंट जनरल पीके सिंह (रिटायर्ड) ने कहा कि नई पीढ़ी को मालूम ही नहीं है कि भारतीय सैनिकों ने कहां-कहां लड़ाई लड़ी है। हम दुनिया के हर हिस्से में थे। यहां तक कि चीन के एक पोर्ट को भारतीय सैनिकों ने जर्मनी से वापस लेकर चीन को दिया था। 
  2. यूरोप और मध्य पूर्व में लोग बताना चाहते हैं कि यहां लड़ाई हुई थी। वहां उन देशों के सैनिकों के मेडल या टोपी यादगार के लिए रखी गई हैं। लेकिन 15 लाख भारतीय सैनिकों के बारे में कुछ नहीं है। 
  3. यूरोप में वह जगहें अब भी वैसी ही हैं जहां लड़ाई हुई थी। युद्ध में जो सबसे पहले गैस अटैक हुआ था उसे भारतीय सैनिकों ने सबसे पहले झेला था। सिंह ने कहा कि हम लोगों को बेटल फील्ड टूरिजम के जरिए यह सब बातें बताएंगे। 
  4. इसके लिए हमने उन देशों के दूतावासों के साथ मिलकर टूर कंपनियों को शामिल कियागाइड बुक बनाई और अब फ्रांस, बेल्जियम, मध्य पूर्व के देशों में बेटल फील्ड टूरिजम चलने लगा है, जिसमें भारतीय सैनिकों के बलिदान और साहस के बारे में भी बताया जा रहा है। 
  5. फ्रांस ने वॉर मेमोरियल के लिए जमीन भी दी है जिसमें भारतीय सैनिकों के बलिदान को याद किया जाएगा। इसका उद्घाटन 10 नवंबर को होना है। लेफ्टिनेंट जनरल पीके सिंह ने कहा कि अगर भारतीय सैनिक शामिल नहीं होते तो पहले विश्वयुद्ध का नतीजा कुछ और ही होता। 
  6. उन्होंने कहा कि भारतीय सैनिकों ने लड़ाई तो लड़ी ही साथ ही लेबर कोर में लाखों भारतीय शामिल थे जो नॉर्थ ईस्ट से थे। उन्होंने माइन फील्ड खोदने का काम किया। उन्होंने कहा कि हमने नॉर्थ ईस्ट के लोगों के योगदान को नई पीढ़ी तक पहुंचाने के लिए नॉर्थ ईस्ट के सभी मुख्यमंत्रियों को पत्र लिखा है। 

 

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