दुष्प्रचार की हद पार करता चीन

 

स्रोत: द्वारा ब्रह्म चेलानी: दैनिक जागरण

 

तिब्बत-भूटान-सिक्किम त्रिकोणीय मार्ग पर हालात एक माह भी तल्ख बने हुए हैं। राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल की चीन यात्र के बाद भी चीनी युद्धोन्माद के कर्कश और अशिष्ट स्वर सुनाई पड़ रहे हैं। हालात ऐसे बनते दिख रहे हैं जिसमें किसी भी विश्लेषक को हिमालयी क्षेत्र में सैन्य संघर्ष की पदचाप सुनाई पड़े। हकीकत में चीन अपनी मनोवैज्ञानिक रणनीति के तहत ही काम कर रहा है जिसमें वह युद्धोन्माद से ही भारत को डराकर बढ़त बनाने की जुगत कर रहा है। मौजूदा संकट चीनी विदेश नीति के दुष्प्रचार के पहलू को मजबूती से रेखांकित करता है। आक्रामक होते हुए भी खुद को पीड़ित के तौर पेश करना और छोटे से देश भूटान में अपनी घुसपैठ पर छद्म आवरण डालना उसके दुष्प्रचार को ही जाहिर करता है

भारत जहां शांतिपूर्वक तरीके से गतिरोध का हल निकालना चाहता है उसके उलट तुनकमिजाज चीन की जंग की धमकी भरी अशिष्ट भाषा और वार्ता के लिए गैर-वाजिब शर्ते उसकी खराब नीयत की ही चुगली करती हैं। भारत के रुख से सहमति जताते हुए अमेरिका ने भी बातचीत के जरिये इसका शांतिपूर्वक हल निकालने की सलाह दी है। यह संकट अपनी सामरिक योजनाओं को सिरे चढ़ाने के लिए मनोवैज्ञानिक युद्ध, मीडिया के इस्तेमाल और कानूनी तर्को का सुविधाजनक प्रयोग करने के चीन के रवैये की पुष्टि करता है। दुष्प्रचार और छल-कपट चीन के मनोवैज्ञानिक युद्ध के दो अहम हथियार हैं। प्राचीन सैन्य रणनीतिकार सुन जू की शैली के आधार पर वह बिना सैन्य हमले के ही भारत को पछाड़ने की फिराक में है। इसमें रोजाना भारत को कड़ा सबक सिखाने की धमकी भी शामिल है

तानाशाह चीन को दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत में राजनीतिक विरोध को भुनाने से भी गुरेज नहीं है। चाहे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी राहुल गांधी के साथ मेल-मुलाकात हो या फिर कथित हिंदू राष्ट्रवाद को लेकर मोदी को आड़े हाथों लेने की चाल। इनके जरिये वह भारत में विरोध पैदा करने का मंसूबा भी पाले बैठा है। चीनी विदेश मंत्रलय ने भारत को उकसाने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी है। उसने ऐसी भाषा का इस्तेमाल किया जिस पर अशिष्टता भी शरमा जाए। भारत को धमकाने के लिए उसने सरकारी मीडिया को भी खुला छोड़ दिया है। उसका कहना है कि भारत को 1962 से भी ज्यादा बुरी स्थिति का सामना करना पड़ सकता है। एक चीनी मुखपत्र ने भारतीय विदेश मंत्री को झूठा तक कह दिया। चीनी सरकार और उसका मीडिया दुष्प्रचार के मोर्चे पर खूब जुगलबंदी कर रहे हैं। सालाना 10 अरब डॉलर के बजट वाला सरकारी मीडिया चीन के आक्रामक वैश्विक प्रचार तंत्र का अहम हिस्सा है

चीनी दुष्प्रचार की धार लगातार तेज होती जा रही है और वह अधिक लक्ष्यकेंद्रित हो रही है। शायद इसीलिए भारतीय मीडिया के भी कुछ धड़े उसके दुष्प्रचार जाल में फंस जाते हैं। बहरहाल बीजिंग का ढकोसला भी उजागर होता जा रहा है। दो उदाहरणों पर गौर कीजिए। मध्य जुलाई में चीनी सरकारी टेलीविजन सीसीटीवी ने तिब्बत में तैनात माउंटेन ब्रिगेड द्वारा सैन्य अभ्यास का सीधा प्रसारण दिखाया। बाद में यह सामने आया कि ऐसा अभ्यास हर साल होता है। यह मामला इस संकट की शुरुआत से पहले जून का है। सीसीटीवी की रिपोर्ट के तुरंत बाद चीनी सेना के आधिकारिक अखबार पीएलए डेली ने लिखा कि इस गतिरोध से निपटने के लिए बड़े पैमाने पर जंगी साजोसामान तिब्बत भेजा जा रहा है।

यह रिपोर्ट भी कोरी बकवास निकली, क्योंकि भारतीय खुफिया एजेंसियों को तिब्बत में चीन के सैन्य जमावड़े का कोई सुराग नहीं मिला। सवाल उठता है कि ऐसी मनोवैज्ञानिक लड़ाई से चीन आखिर क्या हासिल करने की उम्मीद कर सकता है? अगर भारत चीन के दबाव के आगे समर्पण कर देता है तो अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा को खतरे में डालने के साथ ही चीन का पिछलग्गू बन जाएगा। इसके साथ ही चीन पूवरेत्तर में भारत की पकड़ को कमजोर करने और बड़ी सैन्य चुनौती तैयार करने में सक्षम हो जाएगा। तमाम मनोवैज्ञानिक जंग के बाद भी चीन प्रमुख तथ्यों को झुठलाने में नाकाम है। चीन कई वर्षो से भूटान के उत्तर और पश्चिम में सामरिक लिहाज से अहम इलाकों में चुपचाप सेंधमारी की फिराक में लगा है। डोकलाम पठार पर अपना दावा मजबूत करने के लिए उसने अपना रुख और आक्रामक किया है। इसके लिए सैन्य गश्त बढ़ाने के साथ ही तिब्बती चरवाहों को भी वहां भेजना शुरू किया। इसके साथ ही उसने कुछ प्राकृतिक रास्तों को भी छोटी सड़कों का रूप दिया। भूटान लंबे अरसे से चीनी अतिक्रमण की शिकायत करता आया है। 2009 में उसने अपनी संसद को सूचित किया था कि चीन की सड़क निर्माण गतिविधियों पर उसे आपत्ति है

भूटान की सेना, पुलिस और मिलिशिया में महज 8,000 लोग हैं। जाहिर है उसके पास चीन को आंखें दिखाने की हिम्मत नहीं है। भारत उसका रक्षा साङोदार है, लेकिन उसने भूटानी सुरक्षा बलों को प्रशिक्षित करने में ही अपने कर्तव्य की इतिश्री समझी है। जब चीन द्वारा भूटान की जमीन को हड़पने की हालिया कोशिशें भारत को अपनी सुरक्षा के लिए खतरा लगीं तब नई दिल्ली ने निर्णय किया कि यह लड़ाई जितनी भूटान की है उतनी ही भारत की भी। इस बार चीन रणनीतिक आकलन में गलती कर गया। चीन ने सोचा होगा कि सड़क निर्माण को लेकर भूटान कूटनीतिक विरोध करेगा, लेकिन उसे भारत के त्वरित सैन्य हस्तक्षेप की उम्मीद नहीं होगी। भारत के लिए यह बिल्कुल गवारा नहीं कि चीन डोकलाम पर नियंत्रण के साथ बढ़त बना ले। इससे न केवल त्रिकोणीय मार्ग पर चीन की सैन्य स्थिति मजबूत होगी, बल्कि भारत के पूवरेत्तर राज्य भी उसकी मारक क्षमता की जद में आ जाएंगे।

सिलिगुड़ी गलियारा सबसे संकरे बिंदु पर महज 27 किलोमीटर चौड़ा है जिसे चिकन नेकके नाम से जाना जाता है। अगर चीन डोकलाम में हाईवे बना लेगा तो त्रिकोणीय मार्ग पर भारी टैंकों की आवाजाही में सक्षम होने के साथ ही भारत के साथ सैन्य टकराव की स्थिति में पूवरेत्तर के साथ उसका संपर्क काटने की स्थिति में आ जाएगा। इस आशंका से इन्कार नहीं किया जा सकता कि झुंझलाया चीन इस मनोवैज्ञानिक युद्ध को सैन्य टकराव की शक्ल भी दे सकता है। चीन ने संकेत भी दिए हैं कि भूटान के मामले में वह भारत के किसी भी हस्तक्षेप को बर्दाश्त नहीं करेगा। दरअसल चीन चाहता है कि भारत भूटान को उसके भाग्य के भरोसे छोड़ दे।

 

भूटान में घुसपैठ और भारत को जंग का डर दिखाने की चीनी मंशा को लेकर कुछ बुनियादी और व्यापक सवाल भी उभरते हैं। इसमें एक तो द्विपक्षीय रिश्तों सहित अंतरराष्ट्रीय कानूनों का मखौल उड़ाने वाला चीन का अड़ियल रवैया है। दक्षिण एवं पूर्वी चीन सागर में भी उसका रुख यही जाहिर करता है कि वह संधियों पर दस्तखत जरूर करता है, लेकिन उन्हें अमल में कभी नहीं लाता। दूसरा मसला दुष्प्रचार में उसका बढ़ता विश्वास है जिसमें वह इतिहास से लेकर वर्तमान के तथ्यों को भी तोड़ने से परहेज नहीं करता। इससे तथ्य और कथ्य के बीच की रेखा ही धुंधली जाती है।

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Dr Khan

Dr. Khan began his career of teaching in 1988 as lecturer in a college of University of Delhi. He later taught at Delhi School of Economics, University of Delhi. He has several research papers and books to his credit.
Dr. Khan has been teaching General Studies since February 1992 to IAS aspirants and is very proud of the fact that almost every State and Union Territory in India has some civil servants who personally associate with him.

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