चुनाव सुधार की कठिन डगर

 

स्रोत: द्वारा संजीव पांडेय: जनसत्ता

 

जब भी चुनाव होता है तो चुनाव सुधार पर भी बहस होती है। एक बार फिर चुनाव सुधार को लेकर बातचीत हो रही है। चुनाव सुधार को लेकर चुनाव आयोग ने जितने कदम उठाए हैं उनकी सफलता-विफलता पर भी बात हो रही है। पंजाब और गोवा में चुनाव हो चुके हैं। उत्तर प्रदेश में कई चरणों में हो रहे हैं। लेकिन पंजाब चुनाव संपन्न होते ही चुनाव आयोग द्वारा उठाए गए कदमों की सफलता-विफलता पर बहस हो रही है। आयोग के सामने कुछ शिकायतें भी आई हैं। चुनाव सुधार को लेकर उठाए गए कदमों की सफलता पर सवाल इसलिए उठ रहे हैं कि चुनाव से ठीक पहले मतदाताओं के बीच पैसे भी बांटे गए और शराब भी। पंजाब में मतदान की तिथि से दो दिन पहले पैसे और शराब की आवाजाही खुल कर हुई और आयोग की सुरक्षा की सारी पोल खुल गई। शहरी क्षेत्रों के गरीब मतदाताओं के बीच दाल, आटा, चावल दिए गए। आयोग को समय पर सूचना भी मिली, लेकिन वह कार्रवाई में विफल रहा।  जनता की आकांक्षाओं को पूरा करने के लिए चुनाव प्रणाली में सुधार की बात पिछले कई सालों से हो रही है।

चुनाव प्रणाली में उन बदलावों को चुनाव सुधार कहते हैं जो चुनाव को पारदर्शी बनाएं, चुनाव को धन-बल से प्रभावित होने से रोकें, यह सुनिश्चित करें कि विधायिका में आपराधिक पृष्ठभूमि वाले लोगों का प्रवेश न होने पाए। इसमें निष्पक्ष चुनाव से लेकर चुनावों में आधुनिक तकनीक का उपयोग भी शामिल है। वैसे तो चुनाव सुधार में कई आदर्श तरीकों को स्थापित करने की बात की गई है, लेकिन इसके लिए देश के राजनीतिक दल दिल से तैयार नहीं हैं। यही कारण है कि दिनेश गोस्वामी समिति समेत चुनाव सुधार को लेकर समय-समय पर बनी अनेक समितियों की सिफारिशों पर अमल हमेशा टलता रहा है। चुनाव सुधार का अहम हिस्सा चुनावी आचार संहिता का कड़ाई से पालन है। चोरी-छिपे शराब और पैसे बांट कर वोट जुटाने पर रोक लगाना इस संहिता के तहत एक प्रमुख तकाजा है। आयोग इस क्षेत्र में लगातार सफलता की बात कर रहा है। पर जमीनी सच्चाई कुछ और है। चुनावों में न तो धन-बल पर रोक लग पा रही है न ही शराब-वितरण पर। राजनीतिक दल ऐसे किसी भी राजनीतिक कार्यकर्ता को टिकट देने को तैयार नहीं हैं जो करोड़पति न हो। वैसे में चुनाव सुधार का यह दावा यहीं पर फुस्स हो जाता है। बेशक चुनाव आयोग तमाम दावे करे, लेकिन चुनावों में पैसे भी बंट रहे हैं और शराब भी। पंजाब इसका उदाहरण है। पंजाब में 4 फरवरी को मतदान हुआ। मतदान के एक हफ्ते पहले से मतदाताओं के बीच धड़ल्ले से शराब बांटी जा रही थी। यही नहीं, मतदान से दो दिन पहले मतदाताओं के बीच जमकर पैसे बांटे गए।

वीआइपी उम्मीदवारों के चुनाव क्षेत्रों में पैसे बांटने की शिकायतें कुछ ज्यादा ही आर्इं। शिकायत यह भी है कि आयोग के पास जब समय पर शिकायत पहुंचाई गई तो उसने सक्रियता नहीं दिखाई। पंजाब के कुछ वीआइपी चुनाव क्षेत्रों में किसानों के ऋण राजनीतिक दलों ने अपनी जेब से पैसे देकर माफ करवा दिए। आढ़तियों को बुलाकर उनसे परनोट फड़वाए गए और उन्हें नकद पैसे दिए गए। एक वीआइपी विधानसभा क्षेत्र में कई करोड़ रुपए के ऋण माफ किए गए, जिसका पूरा खर्च एक राजनीतिक दल ने उठाया। चुनावों में धर्म, जाति और पंथ के इस्तेमाल को लेकर लगातार सवाल उठ रहे हैं। इस पर रोक लगाने की मांग हो रही है। मामला न्यायालय तक गया है। सर्वोच्च अदालत ने पिछले दिनों कहा भी कि धर्म और जाति के नाम पर वोट मांगना अवैध है।

लेकिन इस सच्चाई से भाग नहीं सकते कि देश के राजनीतिक दल पंथ, धर्म और जाति से ऊपर नहीं उठ रहे हैं। वे मुद्दों पर चुनाव ल़ड़ने के बजाय चुनाव से ठीक पहले धार्मिक स्थलों पर जा रहे हैं। पंजाब में जिस तरह से सारे राजनीतिक दलों ने विभिन्न डेरों के चक्कर लगाए उससे तय हो गया कि राजनीति में जनता के मुद्दों के बजाय पंथ, धर्म और जाति अभी अधिक महत्त्वपूर्ण हैं। पंजाब के मालवा इलाके में तो सारे राजनीतिक दलों के प्रत्याशियों ने डेरों के चक्कर काटे। यह लोकतंत्र के लिए खतरनाक संकेत है। क्योंकि इनका समर्थन सरकार की नीतियों को तो प्रभावित करता ही है, साथ ही ज्वलंत मुद्दों को गौण बना देता है। राजनीतिक दल शार्टकट खोजते हैं। उन्हें लगता है कि जब जातिगत गोलबंदी और धार्मिक गुरुओं की कृपा से वोट जुटाए जा सकते हैं, तो जनता की समस्याओं के फेर में क्यों पड़ें!

चुनाव सुधार का महत्त्वपूर्ण हिस्सा है चुनावों में इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन का इस्तेमाल। इवीएम इस्तेमाल करने के पीछे कई तर्क हैं। बिहार जैसे राज्य में तो मतपेटी लूट ली जाती थी। जाली वोट बंदूक के बल पर डाले जाते थे। वहीं बैलेट पेपर से मतदान की गति धीमी रहती थी। मतगणना में दो दिन तक का समय लगता था। चुनाव आयोग ने एक महत्त्वपूर्ण सुधारात्मक कदम उठाते हुए इवीएम से मतदान शुरू कराया। इसके अच्छे परिणाम आए। मतगणना शुरू होने के कुछ घंटों के अंदर ही चुनाव परिणाम आने शुरू हो गए। लेकिन समय बीतने के साथ चुनावों में इवीएम को लेकर तमाम सवाल उठ रहे हैं। हाल ही में चंडीगढ़ नगर निगम चुनाव में एक राजनीतिक दल ने इवीएम में छेड़छाड़ का आरोप लगाया। अब मामला न्यायालय तक पहुंच गया है। ऐसे में अब चुनाव आयोग को राजनीतिक दलों समेत उनके समर्थक मतदाताओं के मन में इवीएम को लेकर उठ रही शंकाओं को दूर करना होगा।

पंजाब चुनाव के खत्म होते ही इवीएम को लेकर कई सवाल उठ रहे हैं।  पहले अगर बूथों पर कब्जा होता था, मतपत्र लूटे जाते थे, तो अब इवीएम में छेड़छाड़ की आशंका व्यक्त की जा रही है।। चार फरवरी को जैसे ही पंजाब में चुनाव खत्म हुए, पंजाब में चुनाव लड़ रहे दोनों प्रमुख विपक्षी दलों ने इवीएम की सुरक्षा को लेकर सवाल उठा दिए। उन्होंने इवीएम में छेड़छाड़ की भी आशंका व्यक्त की। कांग्रेस के खेमे में इवीएम से छेड़छाड़ की आशंका पर लगातार विचार-विमर्श होता रहा। वहीं आम आदमी पार्टी ने एक जगह पर इवीएम टेंपरिंग का आरोप ही लगा दिया है। हालांकि चुनाव आयोग की तरफ से आश्वासन दिया गया कि इवीएम को कड़ी सुरक्षा में रखा गया है और इसमें छेड़छाड़ की कोई आशंका नहीं है। विपक्षी दल इवीएम को लेकर फिर भी डर जता रहे हैं।

 

विपक्षी दलों को बिहार और दिल्ली के विधानसभा चुनावों को याद करना चाहिए। दोनों राज्यों के चुनाव परिणाम बताते हैं कि इवीएम में छेड़छाड़ की शंका निराधार है। लेकिन चुनाव आयोग को भी राजनीतिक दलों की यह शंका दूर करनी होगी। क्योंकि अमेरिकी चुनाव में रूसी हैंकिंग के आरोप के बाद इवीएम से छेड़छाड़ को लेकर आशंका बढ़ी है। वैसे भारत में ईवीएम में छेड़छाड़ का अंदेशा कुछ साल पहले से ही उठता रहा है। 2009 में जब मनमोहन सिंह के नेतृत्व में यूपीए की सरकार दुबारा केंद्र में आई थी तो इवीएम में छेड़छाड़ और हेराफेरी के आरोप लगे थे। सुब्रमण्यम स्वामी इस आरोप को लेकर काफी मुखर थे। वैसे में इवीएम के साफ-सुथरे इस्तेमाल को लेकर चुनाव आयोग को मजबूती से अपना पक्ष रखना होगा।

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