अभाव की दिक्कत से निपटने की जुगत

 

स्रोत: द्वारा नीलकंठ मिश्रा: बिज़नेस स्टैण्डर्ड

 

सरकार की बहुचर्चित जाम (जन धन, आधार और मोबाइल) त्रयी में ढेर सारी संभावनाएं मौजूद हैं। जब सभी के पास बैंक खाता होगा उनकी विशिष्टï तौर पर पहचान हो सकेगी और वे अपना पैसा बिना किसी बिचौलिये के निकाल सकेंगे, उनकी सब्सिडी सुरक्षित हो सकेगी और समूची व्यवस्था की लागत कम हो जाएगी। बहरहाल, ये कदम आवश्यक हैं लेकिन मजबूत सब्सिडी आपूर्ति व्यवस्था के लिए पर्याप्त नहीं हैं। मसलन आप लाभार्थियों का चयन किस प्रकार करेंगे? इससे पहले यह कहा गया कि एक कार्ड सब्सिडी का आधार होगा। अपेक्षाकृत संपन्न वर्ग के लोगों ने रास्ता निकाल लिया और वे अपात्र होने के बावजूद सब्सिडी का लाभ लेते रहे। जबकि जरूरतमंद तबका इस तक पहुंच नहीं पाता था। जमीनी काम करने वालों को पता है कि गरीबी रेखा के नीचे (बीपीएल) कार्ड हासिल करके कई तरह की सब्सिडी हासिल की जा सकती है। किसे ग्रामीण आवास सब्सिडी मिलेगी यह तय करना सरपंच का काम है, ऐसे में वह इसमें बड़ा हिस्सा अपने लिए मांग सकता है।

यही वजह है कि हम मानते हैं कि सरकार के 2011 के सामाजिक-आर्थिक जाति जनगणना (एसईसीसी) के आंकड़ों का प्रयोग करने से इस पूरी प्रक्रिया में नाटकीय सुधार आएगा। अगर इसे भी शामिल कर दिया जाए तो जाम का नाम जाम्स हो जाएगा। जिस समय यह सर्वेक्षण कराया जा रहा था उस वक्त न तो देश के नागरिकों को और न ही सर्वेक्षण से जुड़े लोगों को पता था कि इसका इस्तेमाल सब्सिडी को लक्षित करने में किया जाएगा। इसकी मदद से आंकड़ों की हेरफेर बंद होगी। अहम बात यह है कि इसमें खासतौर पर ऐसे मानक शामिल किए गए हैं जो उपयोगी साबित होंगे।

उदाहरण के लिए दोपहिया और अन्य वाहनों के मालिकों को स्वत: बाहर कर दिया गया है। इसके अलावा घर का आकार, पेशे की प्रकृति, घर में वयस्कों की संख्या आदि तमाम बातों का ध्यान रखा गया है। इसके अलावा जनगणना की भांति इस गणना में वर्ष 2011-13 के दरमियान जुटाए गए आंकड़ों को भी गोपनीय रखे जाने की आवश्यकता नहीं है। अन्य सरकारी विभाग भी इनका इस्तेमाल बखूबी कर सकते हैं। प्रधानमंत्री ग्रामीण आवास योजना में इसका इस्तेमाल करके उन शुरुआती 33 लाख घरों को चिह्निïत किया गया है जिनको सब्सिडी मिलनी है। इसके लिए बड़े पैमाने पर मानकों का इस्तेमाल किया गया। वितरण की प्रक्रिया अत्यधिक कठिन है। आम घरों को अपने आधार और बैंक खातों को जोडऩे की आवश्यकता है ताकि बिचौलियों का अंत हो सके। जियो टैगिंग से एक जगह पर एक साथ कई दावे नहीं किए जा सकेंगे। लोगों को अपने मौजूदा घर की तस्वीर अपलोड करनी होगी तभी पहली किस्त जारी की जाएगी। इस योजना के लक्ष्य जहां अधिक महत्त्वाकांक्षी प्रतीत हो रहे हैं। परंतु इसकी मापने की प्रक्रिया बेहतर है जबकि ऐसी योजनाओं में इसी मोर्चे पर नाकामी हाथ लगती थी।

समय बीतने के साथ-साथ एसईसीसी के आंकड़ों का इस्तेमाल अन्य योजनाओं में करने का इरादा भी है। ऐसे में उन लोगों से एक कदम आगे रहने में मदद मिलेगी जो सरकारी योजनाओं की खामियों का पता लगाकर उनका दोहन करते हैं। इतना ही नहीं ऐसा करने से जरूरी चुनौतियों और लक्ष्यों को प्राप्त करने की दिशा भी सही बनी रहेगी। यह अत्यंत महत्त्वपूर्ण कदम है। इसकी मदद से न केवल सरकारी योजनाओं की क्षमता में सुधार होगा बल्कि आर्थिक बदलावों की बेहतर निगरानी करना भी संभव बना रहेगा

समग्र दृष्टि डाली जाए तो यह आंकड़ा कुछ दिक्कतदेह प्रश्न भी खड़े करता है। उदाहरण के लिए इससे पता चलता है कि ग्रामीण भारत में आय की जबरदस्त असमानता है। यह बात चकित नहीं करती है लेकिन इसका यह अर्थ नहीं कि ऐसा होना ही चाहिए। ग्रामीण परिवारों में से 30 फीसदी खेती करते हैंग्रामीण जीडीपी में कृषि की हिस्सेदारी 29 फीसदी है, यह हम सभी जानते हैं। यानी कृषि से होने वाली औसत आय काफी हद तक ग्रामीण औसत आय के अनुरूप ही है। ये औसत भ्रामक साबित हो सकते हैं, यह बात हम सभी जानते हैं क्योंकि किसानों में गरीब भी हैं और अमीर भी। परंतु परेशान करने वाली बात यह है कि 51 फीसदी लोग श्रमिक हैं और ग्रामीण जीडीपी में उनका हिस्सा बेहद कम है

कुछ लोगों ने इन आंकड़ों की विश्वसनीयता पर प्रश्न खड़ा किया परंतु मोटे तौर देखा जाए तो ये आंकड़े एकदम सही प्रतीत होते हैं क्योंकि हर तीसरे घर में गरीबी के तय मानक साफ नजर आते हैं। इसमें एक या उससे कम वाले कच्चे घर (13 फीसदी), भूमिहीन श्रमिक (30 फीसदी) और 25 की उम्र के निरक्षर पारिवारिक सदस्य (24 फीसदी) शामिल हैं। करीब 18 करोड़ की ग्रामीण आबादी में 10 फीसदी से भी कम के पास वेतन वाला रोजगार है और चिंता की बात है कि इनमें से केवल दो तिहाई सरकारी हैं। 3.5 फीसदी ग्रामीण रोजगार निजी क्षेत्र में हैं। केवल 1.6 फीसदी ग्रामीण घरों में गैर कृषि निजी उद्यम हैं। इसे पता चलता है कि सरकारी नौकरियों में रोजगार के लिए आरक्षण के प्रति इस कदर आकर्षण क्यों है।

इससे यह भी पता चलता है कि देश का कारोबारी जगत ग्रामीण भारत में कितनी कम पहुंच रखता है। कृषि उत्पादकता बढऩे से खाद्यान्न की मांग कम हो रही है, ऐसे में कृषि क्षेत्र से लोगों का मोहभंग हो रहा है। क्या सरकार ग्रामीण इलाकों में घर के आसपास दुकानों आदि को प्रोत्साहन देने में भूमिका निभा सकती है। ऐसा इसलिए भी सही है क्योंकि शहर अब पलायन को बरदाश्त करने की स्थिति में नहीं नजर आ रहे। अगर सरकार का ऐसा इरादा भी हो तो भी क्या वह व्यापक पैमाने पर रोजगार निर्माण को अंजाम दे सकती है। फिलहाल कौशल योजनाओं की स्थिति देखकर तो यह नहीं लगता।

 

अब सबसे अच्छा यही होगा कि सरकार ग्रामीण क्षेत्र के मूलभूत बुनियादी ढांचे में सुधार लाए और उसके बाद शेष को लोगों पर छोड़ दिया जाए। ग्रामीण सड़कों जैसी जगहों पर निवेश जुटाना बहुत मुश्किल है। इस वित्त वर्ष में 50,000 किलोमीटर सड़क बनाई जानी है। ग्रामीण घरों में बिजलीकरण का लक्ष्य पूरा करने के लिए अगले वर्ष 43 फीसदी अधिक राशि आवंटित की गई है। इसके अलावा टेलीफोन सेवाओं का विस्तार भी आवश्यक है। परंतु इसके अलावा कानून व्यवस्था में सुधार, आंकड़ों की उपलब्धता, ऋण की पहुंच और बाजार तक अच्छी पहुंच भी उतनी ही आवश्यक है। इसमें निर्यात बाजार और कृषि प्रसंस्करण शामिल हैं।

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