एक भूले-बिसरे नायक की याद

 

स्रोत: द्वारा ह्रदयनारायण दीक्षीत: दैनिक जागरण

 

सिद्ध और प्रद्ध प्रेरक होते हैं। उनकी स्मृति भविष्य निर्माण की प्रेरणा देती है, लेकिन इतिहास विजेताओं का कहीं ज्यादा महिमामंडन करता है। इतिहास में संपूर्ण मानवता को एक परिवार बताने वाले महानायकों को कम स्थान मिलता है। भारत के मध्यकालीन इतिहास में शाहजहां के पुत्र दारा शिकोह की भी उपेक्षा हुई है। भारत को उन्हें बारंबार याद करना चाहिए। शिकोह के परिश्रम से ही प्राचीन भारतीय दर्शन का प्रवाह अंतरराष्ट्रीय फलक पर चर्चित हुआ था। दारा शिकोह ने 1657 में 50 भारतीय उपनिषदों का अनुवाद संस्कृत से फारसी में किया था। उपनिषदों में संपूर्ण ब्रांड को एक अस्तित्वबताया गया है

19वीं सदी की शुरुआत में फ्रांसीसी विद्वान आकतील दुपेरो ने इनका अनुवाद फारसी से लैटिन में प्रकाशित किया। जर्मन के प्रद्ध दार्शनिक शापेनहावर ने इसे पढ़ने के बाद कहा, ‘यहां हर चीज में भारत का वातावरण और प्रकृति से संलग्न आदिम जीवन स्पंदित है और मानस उन सभी यहूदी अंधविश्वासों से कैसे धुल कर साफ हो जाता है जिन्हें वह अब तक पाले हुए था।मार्क्सवादी चिंतक डॉ. रामविलास शर्मा की टिप्पणी है, ‘यूरोप का पुनर्जागरण, यूनानी संस्कृति की नई प्रेरणा, धार्मिक सुधार आंदोलन, औद्योगिक क्रांति, नवीन वैज्ञानिक चिंतन-इन सबके बावजूद धार्मिक अंधविश्वास लोक मानस में दृढ़ता से जमे हुए थे। वेदांत ने शोपेनहावर के इन्हीं विश्वासों को उच्छिन्न कर दिया था।

औरंगजेब के बड़े भाई दारा शिकोह संपूर्ण मानवता में एक ही तत्व दर्शन के आग्रही थे। भारत 1947 में स्वतंत्र हुआ था। राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में औरंगजेब के नाम पर सड़क थी, लेकिन भारतीय दर्शन और भारतीयता के पोषक दारा शिकोह को कोई स्थान नहीं मिला। दारा के पिता शाहजहां उन्हें शासक बनाना चाहते थे। वह अपने पिता के बड़े पुत्र थे लेकिन औरंगजेब ने अब्बा शाहजहां को जेल में डाला और शिकोह को दगा देकर मार दिया। जिंदगी में राज और राजधानी नहीं मिली, लेकिन मरने के लगभग 350 बरस बाद उन्हें फिर से याद किया गया। नई दिल्ली नगर पालिका परिषद बधाई की पात्र है कि विगत 6 फरवरी को ब्रिटिश शासन के एक प्रतीक लार्ड डलहौजी के नाम वाली सड़क को दारा शिकोह के नाम पर कर दिया गया। शिकोह को भुलाया नहीं जा सकता। औरंगजेब को भी नहीं। औरंगजेब असहिष्णुता, कट्टरता और आक्रामकता का प्रतीक है तो दारा भारतीय दर्शन, संस्कृति और प्रीति-रीति का नायक।

भारतीय दर्शन और संस्कृति यूं ही दुनिया भर में लोकप्रिय नहीं हुए। पाणिनि ने दुनिया का सबसे पहला शब्द अनुशासन बनाया। संस्कृत दुनिया की सर्वाधिक समृद्ध भाषा बनी। विलियम जोंस भी संस्कृत की प्रशंसा को बाध्य हुआ। कौडिन्य और अगस्त्य जैसे विद्वानों ने भारतीय ज्ञान को अंतरराष्ट्रीय बनाने के लिए यात्रएं की। विवेकानंद ने विश्व एकात्म का वेदांत दर्शन अंतरराष्ट्रीय बनाया। पतंजलि ने ईसा के लगभग 180 बरस पहले योग सूत्र लिखे। योग अब वैश्विक स्तर पर मान्य विज्ञान हो चुका है। ऐसे महानायकों की सूची अंतहीन है, लेकिन इतिहास का मध्यकाल हमारे अपने घर में हमारी संस्कृति को रौंदने के लिए जाना जाता है। तब भी समूचे मध्यकाल या गैर हिंदू शासन को एक जैसा नहीं देखा जाना चाहिए। इसी काल में अकबर हैं। अकबर भी नया सोचता था। उसने दीन-ए-इलाही नाम से अपना नया पंथ चलाया। शासक था और यदि वह अन्य शासकों की तरह जोर जबर्दस्ती करता तो दीन-ए-इलाही पंथ की संख्या सिर्फ 12 ही नहीं होती। शाहजहां के शासनकाल में भी संस्कृत और हिंदी खासी फलती-फूलती रहीं। क्या हुआ जो फारसी भी साथ-साथ चली।

दारा शिकोह संस्कृत प्रेमी था। उपनिषदों का रहस्य काव्य उसकी बौद्धिक संपदा थी। वह तमाम दृष्टिकोण के पंथिक विद्वानों को सुनता था। उनकी प्रतिष्ठित पुस्तक मजमा उल बहरेनवैदिक और सूफी तत्वज्ञान का संगम है। दारा शिकोह जैसा दूसरा नायक इतिहास में नहीं है। रहस्य जिज्ञासा को लेकर उसकी तुलना लेबनानी चिंतक खलील जिब्रान से हो सकती है, लेकिन जिब्रान के चिंतन में उड़ान ज्यादा है, वहीं शिकोह में भारतीयता का वास है, वेदांत का अपनत्व है। दारा शिकोह ने कट्टरपंथियों की चिंता नहीं की और भारत के अंतर्मन को स्थापित करने का उद्यम किया। उसके व्यक्तित्व में भारत का जन गण मन था, लेकिन भारत का बड़ा भाग उनसे अपरिचित है। फिर भी बौद्धिक क्षेत्र में उनके व्यक्तित्व पर बड़ा काम हुआ है। हाल में उपनिषद् गंगानाम से एक टेलीविजन धारावाहिक आया। उसमें धर्म के स्नोत की चर्चा है। दारा शिकोह भी एक पात्र है। दारा शिकोह पर विधर्मी होने के आरोप लगाए गए थे। अकबर एस अहमद की किताब दि ट्रायल ऑफ दारा शिकोहमें बड़ी खूबसूरती से कट्टरपंथ के सवाल आधुनिक संदर्भ में भी उठाए गए हैं।

कट्टरपंथ स्वतंत्र चिंतकों को बर्दाश्त नहीं करता। सुकरात के साथ भी ऐसा ही हुआ था। वे देवों के अस्तित्व को चुनौती दे रहे थे। सत्ता ने सुकरात के साथ ही तर्क और विवेक को भी प्राणदंड सुनाया। मगर सुकरात नहीं मरा। तर्क प्रश्न विश्वज्ञान के अमर उपकरण हैं। संप्रति पंथ मजहब उग्र हो रहे हैं। विश्व के बड़े भाग में मजहब के नाम पर रक्तपात हो रहे हैं। बम चल रहे हैं। परमाणु बम की धमकियां मिल रही हैं। भारतीय दर्शन और अनुभूति इनका समाधान हैं।

ब्रह्माण्ड संपूर्ण अविभाज्य अखंड सत्ता है। विश्व स्वाभाविक रूप में एक जीवमान एकता है। मत, पंथ, जाति मजहब हमारे द्वारा गढ़ी गई सामूहिक अस्मिताएं हैं। अनेक पंथ हैं, मजहब और मत भी। अनेक रूपों में प्रकट यह विश्व वैज्ञानिक खोजों में भी एक ही देखा गया है। उपनिषद् भी विश्व को एक ब्रांडीय सत्ता बताते हैं। कल्पना करें कि दारा शिकोह द्वारा उपनिषदों का फारसी अनुवाद न होता तो उनका लैटिन अनुवाद भी न होता। फिर उनका अन्य भाषाओं में भी अनुवाद कैसे होता? ऋग्वेद दुनिया का प्राचीनतम ज्ञानकोष है। मैक्समूलर के अनुवाद के बाद इसकी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर धाक जमी और यूनेस्को ने इसे अपनी विश्व धरोहर सूची में जगह दी।

 

दारा शिकोह अनूठा है। इटली के कवि दांते जैसा। उसमें अंग्रेजी के कवि पीबी शेली जैसी अनुभूति है, लेकिन शेक्सपियर जैसा द्वंद्व नहीं है। उसकी चिंतन दृष्टि सुस्पष्ट है। वह इस्लाम नहीं छोड़ता, इस्लाम का विरोध भी नहीं करता। वह सीमा मर्यादा में रहकर सतत प्रश्नाकुल रहता है। ज्ञान और दर्शन की प्यास में वह अतिक्रमण भी करता है। इस उड़ान में वह पंख फैलाकर सारा आकाश नापता है। भारत उसके साथ रहता है। वेदांत उसे प्रिय लगता है। वह उपनिषदों से जुड़ता है। उपनिषद् तत्व उसे खींचते हैं। अपने घर परिवार, पंथ-मजहब और समाज में रहकर सत्य की खोज में जुटे इस महान राजकुमार की हत्या सनसनी पैदा करती है। लगभग 350 बरस बाद उसके नाम हुई एक सड़क ने धीरज दिया है। दुनिया के अन्य देशों ने स्वतंत्र चिंतकों, सर्जकों के नाम तमाम स्मारक बनाए हैं। हम भारत के लोग इस काम में कंजूस क्यों हैं? दिल्ली में एक पुस्तकालय के अलावा दारा के नाम पर कुछ नहीं। दारा शिकोह के व्यक्तित्व को अभी और याद किए जाने की आवश्यकता है।

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Dr Khan

Dr. Khan began his career of teaching in 1988 as lecturer in a college of University of Delhi. He later taught at Delhi School of Economics, University of Delhi. He has several research papers and books to his credit.
Dr. Khan has been teaching General Studies since February 1992 to IAS aspirants and is very proud of the fact that almost every State and Union Territory in India has some civil servants who personally associate with him.

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