कैसे दोगुनी होगी आय?

स्रोत: द्वारा आनन्द किशोर: राष्ट्रीय सहारा

बजट पेश करते हुए वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा कि उनकी सरकार का हर काम एवं प्रत्येक योजना के केंद्र में गांव, गरीब और किसान होते हैं। उन्होंने ग्रामीण सड़कों के लिए वित्तीय वर्ष 2019-20 में 19 हजार करोड़ खर्च करने, सोलर ऊर्जा और कृषि कचरे का उपयोग कर किसानों को अन्नदाता से ऊर्जादाता बनाने, रसोईघर को विलायती खाद्य तेलों से मुक्ति दिलाने को प्राथमिकता देने और जीरो बजट खेती जैसे सुंदर विचारों को परोसते हुए किसानों की आय दोगुनी करने का भरोसा दिलाया है।

कृषि बजट में 2018-19 के संशोधित बजट आवंटन 75752.13 करोड़ रुपये की तुलना में वृद्धि कर 138560.97 करोड़ की गई है। कृषि के लिए सबसे महत्त्वपूर्ण सिंचाई मद में 2018-19 के संशोधित बजट अनुमान 8251 करोड़ में मामूली वृद्धि कर 2019-20 में 9682 करोड़ की गई। इसी प्रकार, फसल बीमा योजना से सभी किसानों को जोड़ने और सुखाड़ की भयावहता को देखते हुए फसल बीमा योजना में पिछले वर्ष के संशोधित अनुमान 13976 करोड़ से मात्र 24 करोड़ बढ़ाकर 14000 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है।

प्रधानमंत्री की महत्त्वाकांक्षी किसान सम्मान योजना मद में 75,000 करोड़ रुपये के प्रावधान का ऐलान विगत अंतरिम बजट में ही किया गया था, जिसमें कोई वृद्धि नहीं की गई है, जबकि केंद्र सरकार के प्रथम कैबिनेट में ही सभी किसानों को किसान सम्मान योजना के तहत जोड़ने का ऐलान किया गया है, जो संख्या 12 करोड़ से बढ़कर करीब 14 करोड़ किसानों का होगा। इससे सभी किसानों को किसान सम्मान योजना का लाभ नहीं मिल पाएगा। बजट में सभी कैटेगरी के किसानों को जोड़कर राशि का आवंटन नहीं किया गया है।

आम बजट से किसानों को बड़ी उम्मीदें थीं, क्योंकि किसानों ने बगैर आगे-पीछे देखे अपने वोटों से मोदी जी की थैली भर दी थी परन्तु बजट ने उन्हें निराश किया है। देश के सामने सबसे बड़ी चुनौती सुखाड़ की है, जिससे सर्वाधिक परेशान किसान ही होते हैं। उस गरीब किसान के पास साधन की कमी होती है मगर समस्या पीने के पानी और प्यासी धरती के सिंचाई की भी रहती है। वित्त मंत्री ने सुखाड़ पर चुप्पी साध ली और सिंचाई पर आवंटन मामूली बढ़ाया।

सिंचाई पर दिए गए आवंटन से कृषि क्षेत्र में सिंचाई के विस्तार की बात दूर लंबित परियोजनाओं के पूरा होने पर विशेषज्ञ संदेह व्यक्त कर रहे हैं। इसी प्रकार, सूखा की भयावह स्थिति और बाढ़ सुखाड़ दोनों की समस्याओं से जूझ रहे किसानों को फसल बीमा का लाभ दिलाने के लिए सभी किसानों और संपूर्ण कृषि क्षेत्र तक फसल बीमा की पहुंच बढ़ाने और लाभ दिलाने की दिशा में बजट में समुचित आवंटन नहीं दिया गया है। अभी तक फसल बीमा से करीब 27 फीसद किसान और 28 फीसद क्षेत्र ही जुड़ सके हैं।

प्रधानमंत्री किसान सम्मान योजना से नई सरकार ने सभी किसानों को जोड़ने का सराहनीय कार्य अवश्य किया है, लेकिन उससे बटाईदारों को वंचित रखा गया है। किसान सम्मान योजना के तहत 5 सौ रुपये मासिक को बढ़ाने की भी मांग किसान नेताओं और उद्योग जगत के संगठनों द्वारा भी की गई थी, जिसका वित्त मंत्री ने अनदेखी कर दी। किसान नेताओं का मानना है कि 500 रुपये मासिक के ऐलान से पूर्व डीएपी उर्वरक की कीमत में 4 सौ रुपये बैग की बढ़ोतरी कर दी गई थी, डीजल की कीमत 10 से 20 रुपये लीटर बढ़ने से खेती के सभी साधनों के मूल्य बढ़ गए।

बिजली और मजदूरी दर बढ़ी। इस सबके बावजूद सरकार स्वामीनाथन आयोग की अनुशंसा के आलोक में फसल का मूल्य तय नहीं किया, जो भी एमएसपी तय किया उस पर सरकारी खरीद नहीं हुई। किसान-मजदूर 350 और 400 रुपये क्विंटल कम पर धान गेहूं बेचने को विवश हुए। आंकड़े बताते हैं कि कृषि उत्पाद के सरकारी खरीद की पहुंच महज 30 फीसद किसानों तक ही है। इस प्रकार किसान सम्मान योजना की राशि किसानों के लिए तब तक उपयोगी नहीं बनेगी, जब तक उसे किसानों की आय और जीवनयापन से न जोड़ा जाए।

तेलंगाना सरकार ने इस दिशा में कुछ अच्छा प्रयास जरूर किया है। किसानों के खेती की लागत घटाने के लिए उर्वरकों, कृषि यंत्रों, कीटनाशकों, बिजली दरों पर किसानों को और राहत और मनरेगा से खेती को जोड़कर मजदूरों की मजदूरी की राशि किसानों और सरकार दोनों स्तर से भुगतान कर मजदूरों का पलायन रोकने, कृषि अनुसंधान पर जोर देकर प्राकृतिक आपदा के अनुकूल खेती के लिए बीजों के उत्पादन और अन्य शोध के कार्य पर भी बजट में कुछ नहीं है फिर किसानों की लागत घटेगी नहीं। कृषि विकास दर बढ़ेगी नहीं तो आय दोगुनी करने का वायदा जुमला बनकर रह जाएगा।

वित्त मंत्री ने यह भी नहीं बताया कि किसानों की आय दोगुनी करने के लिए विगत तीन वर्षो की क्या उपलब्धि है? वित्त मंत्री ने आम बजट पेश करते हुए सरकार द्वारा जीरो बजट फार्मिग के लिए किसानों को प्रोत्साहित किए जाने का ऐलान किया। उनके अनुसार इस तकनीक से जहां कृषि लागत कम होगी वहीं किसानों की आय दोगुनी करने में भी मदद मिलेगी। जीरो बजट फार्मिग से खेती की लागत और जोखिम कम करने, मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने और जलवायु परिवर्तन की अनिश्चितताओं से बचाने में मदद मिलती है।

इस खेती में जुताई, दौनी बैलों और अन्य कार्य देसी गाय के माध्यम से ही संभव है। डीजल की जरूरत नहीं होगी। ईधन से संचालित साधनों की जरूरत नहीं होगी। आज भारत के आंध्र प्रदेश, कर्नाटक सहित देश के कुछ क्षेत्रों में जीरो बजट खेती की जा रही है परंतु सरकार कोई कार्ययोजना तो बनाए। जीरो बजट खेती में उत्पादन कम होता है। आज की तारीख में सरकार यह ऐलान करेगी कि हम कम फसल उत्पादन का रिस्क लेने को तैयार हैं? मशीनीकरण और रासायनिक उर्वरकों के खेती से जुड़ने के चलते एक तो किसानों को उत्पादन ज्यादा मिलता है, दूसरे मशीनीकरण के चलते किसान बैल रखना छोड़ चुके हैं, देसी गायपालन बंद कर चुके हैं।

जीरो बजट खेती के लिए उसे एकबारगी बैल और देसी गाय पर भारी पूंजी निवेश करने की जरूरत होगी। सरकार द्वारा कर्जमुक्ति नहीं किए जाने से किसान कर्ज में पहले से ही दबा हुआ है। इसके अतिरिक्त सिंचाई की व्यवस्था महत्त्वपूर्ण है, जबकि पानी के स्तर के नीचे गिरने से और नदी-पोखर के सूखने से सिंचाई पर खर्च बढ़ रहा है। फिर जीरो बजट खेती के उत्पाद की मार्केटिंग का सवाल खड़ा होगा। इन बिंदुओं पर अभी तक सरकार का कोई परीक्षण भी नहीं हुआ है। फिर यह आय दोगुना करने मे कैसे सहायक हो सकेगा?

 

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