सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसले में आपसी रजामंदी से तलाक लेने वालों के लिए छह महीने का कूलिंग ऑफ पीरियड खत्म कर दिया। कोर्ट ने कहा हिन्दू मैरिज एक्ट की धारा 13 बी (2) में दी गयी 6 माह की कूलिंग ऑफ अवधि अनावश्यक है।

जस्टिस आदर्श गोयल व यूयू ललित की बेंच कहा कि निश्चित हालात में इस अवधि को छोड़ा जा सकता है। कोर्ट ने फैसले ने कहा , हिन्दू मैरिज एक्ट की धारा 13 बी (2) दी गयी अवधि निर्देशात्मक भर है आवश्यक नहीं। यह अदालत के लिए तय केरने लिए के लिए होगा कि वह हर केस के तथ्यों और स्थिति को देखकर, जिसमें पक्षों के बीच साथ रहने की कोई संभावना ही न हो, इस अवधि को समाप्त कर तलाक दे सकती है। कोर्ट ने कहा जहां ये तथ्य मौजूद हों वहां कोर्ट हिन्दू मैरिज एक्ट की धारा 13 बी (2) के तहत 6 माह की अवधि को छोड़ा का सकता है :-

 
क्या है 
  1. पक्षों के बीच धारा 13बी 1 के तहत एक साल का अलगाव हो चुका हो 
  2. सुलह समझौते के सभी प्रयास फैल हो गए हों और आगे उनकी कोई संभावना भी न हो
  3. पक्षों ने वास्तविक रूप में अपने सभी विवाद जैसे एकमुश्त लेनदेन, बच्चे की कस्टडी और अन्य लंबित विवाद सुलझा लिये हों, ऐसे में उन्हें 6 महीने के लिए कूलिंग ऑफ अवधि बिताने के लिए कहना उनकी व्यथाओं को बढ़ाना ही होगा। 
  4. कोर्ट ने कहा कूलिंग ऑफ अवधि सुलह की संभावना के लिए रखी गयी है लेकिन जब उसकी गुंजाइश ही नही तो उसे बिताने का क्या लाभ।
  5. कोर्ट ने यह फैसला दिल्ली के एक दंपति अमरदीप सिंह बनाम हरवींन कौर की याचिका पर दिया है दम्पति ने मांग की थी वह आठ वर्ष से अलग रह रहे है इसलिये तलाक के लिए छह माह का कूलिंग ऑफ पीरियड समाप्त किया जाये।

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